भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 693

हिन्दी निरुक्त ( २७६ ) ६ अ० ३ पा० ५ खं० ‘सुविदत्र’ (५५) शब्द अनवगत ‘कल्याणविद्य’ या उत्तम विद्या वाला के अर्थ में है— “आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाङ्” अर्थात्—‘अग्ने ! , हे अग्नि देव ! ‘सुविदत्रेभिः’ उत्तम विद्या वाले पितरों के सहित ‘अर्वाङ्’ हमारे अभिमुख ‘आ-याहि’ आ। यह भी निगम है। यहां शब्द की समानता से ‘सुविदत्र’ शब्द ‘कल्याणविद्य’ के अर्थ में है। ‘आनुषक्’ (५६) यह नाम (अनवगत) ‘अनु’ (उपसर्ग) पूर्वक संगार्थक ‘सञ्ज’ (भ्वा० प०) धातु का है। ‘आनुषक’ क्या ? अनुषक्त या पीछे लगा हुआ होता है। “स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्” अर्थात्—जो यज्ञों में ‘आनु- षक्’ अनन्तर अनन्तर (एक से एक) लगी हुई ‘बर्हिः’ कुशाओं को ‘स्तृणन्ति’ बिछाते है।’ यह भी निगम है। ‘तुर्वणि’ (५७) क्या ? तूर्णवनि, अर्थात्—जो शीघ्र वनन (सेवन) करता है। “स तुर्वणिर्महाँ अरेणु पौंस्ये” (“गिरे भृष्टि र्न भ्राजते”) अर्थात्—‘तुर्वणिः’ शीघ्र अपने स्तुति करने वाले को भजने वाला ‘महान्’ प्रभाव से बड़ा ‘सः’ वह इन्द्र ‘अरेणु पौंस्ये’ अन्तरिक्ष (आकाश) में (पर्वतके शिखर के समान चम- कता है)। यह भी निगम है। ‘गिर्वणस्’ (५८) देव होता है। क्यों कि—इसे गिराओं (स्तुतियों) से वनन या याचन करते हैं। “जुष्टं गिर्वणसे बृहत्” अर्थात्- हे स्तोताओ ! तुम ‘गिर्वणसे’ स्तुतियों की गिराओं (वाणियों) से भजन योग्य