निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 699, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २८५ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं० “प्रवोऽच्छा जुजुषाणासो अस्थुरभूत विश्वे अ- ग्रियोत वाजाः । ” अर्थात्-हे ऋभु देवो ! ‘वः’ तुम सब से ( प्र ब्रवीमि )’ कहता हूं, ‘प्र-अस्थुः’ जो हविः भेजे हुए हैं उन्हें ‘अच्छा’ भले प्रकार ‘जुजुषाणासः’ ( जोषयमाणाः ) सेवन करते हुए तुम ‘विश्वे’ (सर्वे) सब ‘अग्रिया’ देव सेना के आगे चलने वाले ‘अभूत’ ( अभवत ) हुए या होते हो । ‘उत’ और हे ‘ वाजाः ’ ' हविओ ! तुम सब भी ऐसे ही हो । इस प्रकार यहां अर्थ के अनुसार और शब्द की समानता से ‘अग्रिया’ पद् ‘अग्रगामिनः’ ( आगे चलने वाले ) के अर्थ में है । ‘अग्रिया’ कैसे ? अथवा अग्र-गमन से, अथवा अग्र-सरण ( चलने ) से, अथवा अपने को अग्र सम्पादन करने से ( बनाने से ) है । अथवा ‘अग्र’-यह पद् अनर्थक उपबन्ध ( ‘या’ प्रत्यय ) को लेता है, अर्थात्-‘अग्र’ शब्द और ‘या’ प्रत्यय के योग से ‘अग्रिया’ शब्द बना है, किन्तु जो अर्थ ‘अग्र’ शब्द का है, वही अर्थ ‘अग्रिया’ का है, क्योंकि ‘या’ प्रत्यय यहां किसी अर्थ में न होकर शब्दमात्र के निर्माण में सहायक होता है । ‘चनः’ (६४) ( चना ) अनवगत अन्नका नाम है । [ लोग कहते हैं कि-चने का नाम वेद शास्त्र में नहीं है, किन्तु यह ख्याल उनका ठीक नहीं है, वेद के मन्त्रों में यह शब्द बहु- तायत से आता है, निघण्टु में यहां प्राधान्य से इस नाम का पाठ है, और यास्काचार्य भी इस ( चन ) शब्द को अन्न का नाम अपने मुख से कहते हैं । ]- “ अद्धीदिन्द्र प्रस्थितेमा हवींषि चनो दधिष्व