भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 700

हिन्दी निरुक्त ( २८६ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं० पचतोत सोमम् ” अर्थात्—'इन्द्र !' हे इन्द्र देव ! 'पचता' पके हुए 'इमा' (इमानि) इन 'प्रस्थिता' (प्रस्थितानि) भेजे हुए या दिये हुए 'हवींषि' हविन्नों को 'अद्धि' तू खा 'घनः' (घने) अन्न को 'दधिष्व' पेटमें धारण कर 'उत' और 'सोमम्' सोम को धारण कर । 'घन' यह अन्न का नाम है । 'पचता' (६५) यह अनवगत एक वचन, द्विवचन और बहुवचन होता है । सो प्रकरण विशेष से निर्णय होता है ।— ( पचता- ) कैसे ? 'पचतिर्नामीभूतः' अर्थात् 'पचति' इस आख्यात पद का ही यह नाम बन गया है । “तं मेदस्तः प्रति पचताग्रभीष्टाम्” अर्थात्-इन्द्रा- ग्नि देवता 'मेदस्तः' मेदा के स्थान में 'पचता' ( पक्वम् ) पके हुए 'तम्' उस पशु को 'प्रति-ग्रभीष्टाम्' ग्रहण करें । यहां 'तम्' का विशेषण होने से 'पचता' यह एकवचनान्त है, ऐसा निश्चय होता है । अथवा 'पचता' यह मेदा और पशु दोनों का सात्व (द्रव्य सम्बन्धी ) द्विवचन हो सकता है । अर्थात्–इन दोनों द्रव्यों के अभिप्राय से द्विवचन है, किन्तु एक वचन नहीं । क्यों कि- जहां एकवचन का अर्थ होता है, वहां वह (एक वचन) प्रसिद्ध होता है । जैसे— “पुरोला अग्ने पचतः” अर्थात्–'अग्ने' हे अग्नि देव ! 'पुरोला' ( पुरोडाशः ) पुरोडाश 'पचतः' ( पक्वः ) पक गया । यहां 'पुरोला' और 'परिष्कृतः' पदोंके सम्बन्ध से तथा शब्द के सारूप्य से 'पचतः' यह एकवचनान्त है । बहुवचन का उदाहरण ' घन ' ( ६४ ) के उदाहरण “अद्धीदिन्द्र” में