निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १८७ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं०
'पचता' आया है। वहां 'हवींषि' बहुवचन पदके सम्बन्ध से वह बहुवचनान्त निश्चित होता है । 'शुरुधः' ( ६६ ) जल होते हैं । क्योंकि-वे 'शुच्' मलके शोक को रोधन करते ( रोकते ) हैं । ( 'शुगुधः' यह शब्द- समाधि उचित है । भग० दु० ।) “ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति पूर्वीः” अर्थात्- क्योंकि-'ऋतस्य' ऋत की सम्बन्धिनी 'पूर्वीः' पहिली 'शुरुधः' आप् ( जल ) हैं। यह भी निगम है । 'अमिनः' ( ६७ ) यह अनवगत 'अमितमात्रः' ( जिसके मन्त्रों का मान ( संख्या ) नहो महान् के अर्थ मे है । अथवा 'अभ्यमितः' ( जो किसी से हिंसितनहो ) के अर्थ में है । “अमिनः सहोभिः” अर्थात्-इन्द्र देव मध्यम और उत्तम लोक में 'सहोभिः' (बलैः) अपने बलों से 'अमिनः' (अमितमात्रः) अमितबल है, या अहिंसित बल है । अर्थात्- उसके बलका किसी ने परिमाण (मांप ) अथवा तिरस्कार नहीं किया है। यह भी निगम है । यहां शब्द की समानता और अर्थ की योग्यता से 'अमिन' शब्द 'अमितमात्र' अथवा 'अहिंसितमात्र' के अर्थ में है । 'जज्झतीः' ( ६८ ) यह अनवगत, शब्द के अनुकरण पर 'आपः' ( जल ) प्रतीत होती हैं अर्थात्-'जज्झती' क्यों ? शब्द करती हैं । “मरुतो जज्झती रिव” अर्थात्-'मरुतः' हे मरुतों ! 'जज्झतीः-इव' शब्द करती हुई नदियों के समान तुम्हारी ऋष्टिओं (अस्त्रों ) के प्रहारों से हत हुए मेघों से बिजली