निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६४ ) ६ अ० ४ पा० २ खं० 'कुलिश' इति वज्रनाम । कुलशातनो भवति । “स्कन्धांसीव कुलिशेनाविवृक्णाहिः शयत उपपृक्पृथिव्याः” [ ऋ०सं० १,२,३६,५ ] । 'स्कन्धः' वृक्षस्य समास्कन्नो भवति । अयमपि इतरः 'स्कन्धः' एतस्मादेव । आस्क- न्नंकाये । अहिः शयते उपपर्चनः पृथिव्याः । ‘तुञ्जः' तुञ्जतेर्दानकर्मणः ॥ २ (१७) ॥ अर्थः-‘स्तियाः’ (७७) (अनवगत) क्या ? जल होते हैं। क्यों ? स्त्यायन ( संहनन ) जोड़ने या जुड़ जाने से क्योंकि जल ही पृथिवी के कणों को जोड़ते हैं, अथवा हिम (शीत) के प्रभाव से स्वयम् जुड़ जाते हैं (पाला या बर्फ हो जाता है।) “वृषा सिन्धूनां वृषभः स्तियानाम्” अर्थात्- हे इन्द्र ! ‘सिन्धूनाम्’ बहने वाले जलों का तू ही 'वृषा' बरसने वाला है। तू ही 'स्तियानाम्' जमे हुए जलों (बरफों का 'वृषभः' बरसने वाला है। यह भी निगम है। यहां शब्द की समानता से ‘स्तियाः' शब्द ‘संहन्त्री’ (जमाने वालीं या स्वयम् ‘संहताः' (जमी हुई) अपों (जलों) के अर्थ में है। शब्द और संघात (इकट्ठा करना या होना) अर्थ में ‘स्त्यै’ (भ्वा०प०) धातु का है॥ 'स्तिपाः’ (७८) (कूप) ‘स्तियापालन’ (जल से अघाने वाला) के अर्थ में है। अथवा 'उपस्थितों (आये हुए प्यासों) को जल के दान से पालन करता है, इससे 'स्तिपा' है।