निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 708, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ४ पा० २ खं०
“ स नःस्तिपा उत भवा तनूपाः ” अर्थात्- हे अग्नि देव ! ‘उत’ और ‘सः’ सो तू ‘नः’ हमारा ‘स्तिपाः’ कूंए के समान ‘ तनूपाः ’ शरीरों को पालने वाला ‘भव’ हो । यह भी निगम है । यहां अर्थ के अविरोध और शब्दकी समानता से ‘स्तिपा’ कूप का नाम है ॥ ‘ जवारु ’ ( ७९ ) ( सूर्य-मण्डल ) क्यों ? वह ‘जवमान- रोहि’ वेग से चलता हुआ आकाश में रोहण करता ( चढ जाता ) है । या ‘जरमाणरोहि’ भूतों को जराता हुआ आ- काश में रोहण करता है । या ‘गरमाण-रोहि’ पृथिवीके रसों ( जलकणों ) को निगलता हुआ आकाश में चढजाता है । “अग्रेरुप आरुपितं जवारु” अर्थात्-हे यजमान त उस वैश्वानर सूर्य देव को भज, जिसके ‘जवारू’ मण्डल को ‘ अग्रे’ पहिली सृष्टि के आदिमें देवताओंने ‘रूपः’ (पृथिव्याः) पृथिवी के ऊपर ‘आरुपितम्’ चढाया या स्थापन किया है । यहां इस प्रकार ‘जवारू’ सूर्य-मण्डल का नाम है ॥ ‘ जरूथ ’ ( ८० ) क्या ? ‘गरूथ’ ( स्तोत्र ) । सो क्यों ? गरण किया जाता या बोलाजाता है । कैसे ? ‘गृणाति’ = गर- णार्थक ‘गॄ’ (क्र्या० प० ) धातु से है । “ जरूथं हन्याक्षि राये पुरन्धिम् ” अर्थात्- हे भगवन् ! अग्नि देव ! वसिष्ठ ने पूर्व कल्प में तेरे प्रति ‘जरूथम्’ ( स्तोत्रम् ) स्तोत्र को ‘इन्’ ( गमयन् ) भेजते हुए ‘पुरन्धिम्’ बहु कर्म वाले अथवा बहु धनके देने वाले तुझको ‘राये’ धनके अर्थ ‘यक्षि’ यजन किया है, वैसे ही मैं भी तेरा यजन करता हूं । यह भी निगम है । यहां शब्द की समानता और अर्थ की उपपत्ति से ‘जरूथ’ यह स्तोत्र का नाम और स्तुत्यर्थक ( ज )