निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ४ पा० ३ सं०
( भ्वा० प० ) धातु का रूप है ॥
‘कुलिश’ ( ८१ ) अनवगत वज्र का नाम है। क्यों ?
यह ‘कूलशातन’ कनारों का तोड़ने वाला है।
“स्कन्धांसीव कुलिशेनाविवृक्णाहिः शयत
उपपृक् पृथिव्याः” । अर्थात्-‘कुलिशेन’ ( वज्रेण ) वज्र से
‘विवृक्णा ( विवृक्णानि = छिन्नानि ) कटेहुए ‘स्कन्धांसि-इव’
स्कन्धों ( वृक्षकी शाखाओं ) के समान इन्द्र के वज्र से छिन्न
हुआ ‘अहिः’ ( मेघः ) मेघ ‘पृथिव्याः’ पृथिवी के ‘उपपृक्’
ऊपर लगा हुआ ‘शयते’ सोता है। यहां मेघ का अवस्थान
ही सोना माना गया है। इस मन्त्रमें वधके संबन्धसे ‘कुलिश’
नाम वज्रका है, यह निर्णीत होता है।
‘स्कन्ध’ क्यों ? वृक्ष के समासक्त या लगा हुआ
होता है।
यह दूसरा ( मनुष्य का ) स्कन्ध भी इसी से होता है।
क्योंकि-वह काय ( देह ) में आसक्त चिपका हुआ होता है।
‘अहिः शयते उपपर्चनः पृथिव्याः’ मेघ सोता है, पृथिवी
पर लगा हुआ ॥
‘तुञ्ज’ ( ८२ ) ( दान ) दानार्थक ‘तुञ्ज’ ( भ्वा० प० )
धातु का है ॥ २ ॥ १७ ॥
( खं० ३ )
निघ०-बर्हणा ॥४३॥
निरु०-“तुञ्जे तुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः
न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ।” (ऋ० सं० १, १, १४, २)
दाने दाने य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणो