निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६७ ) ६ अ० ४ पा० ३ सं० नास्य तैर्विन्दामि समाप्तिं स्तुतेः ॥ ‘बर्हणा’ परिबर्हणा । “बृहच्छ्रवा असुरो बर्हणा कृतः ।” ( ऋ०सं० १, ४, १७, ३ ) । इत्यपि निगमो भवति ॥३(१८) अर्थः—“तुञ्जे तुञ्जे” इस ऋचा का मधुच्छन्दा ऋषि, इन्द्र देवता, गायत्री छन्द और प्रात सवन में ब्राह्मणाच्छंसी के अच्छाप मे विनियोग है । ‘तुञ्जे तुञ्जे’ ( दाने दाने ) दान दान में दान से संतुष्ट हुए हुए मुझ से ‘ये’ जो ‘उत्तरे’ ( उत्तरोत्तरे ) आगे आगे वाले ‘वज्रिणः’ वज्रधारी ‘इन्द्रस्य’ इन्द्र के ‘स्तोमाः’ स्तोत्र साधे जाते हैं, ( तैः ) उन से ( अस्य ) इस की ‘सुष्टुतिम्’ ( स्तुतेः समाप्तिम् ) स्तुति की समाप्ति ‘न’ नहीं ‘विन्चे’ ( विन्दामि) प्राप्त होता हूं अर्थात् जितनी ही स्तुतियें उठाई जाती हैं, वे सब इन्द्र को प्राप्त हो कर न्यून ही हो जाती हैं । इस प्रकार यहां ‘स्तोम’ के सम्बन्ध से ‘तुञ्ज’ शब्द दान का पर्याय है । क्यों कि ‘तुञ्ज’ धातु का दान अर्थ देखा जाता है । ‘बर्हणा’ ( ८३ ) यह अनवगत ‘परिबर्हणा’ ( वृद्धि अथवा हिंसा ) के अर्थ में है । ‘बर्हणा’ के आदि में ‘परि’ उपसर्ग जोड़ने से उस के अर्थ की प्रसिद्धि हो जाती है । “बृहच्छ्रवा असुरो बर्हणा कृतः” अर्थात् इन्द्र ने ‘बर्हणा’ अपनी वृद्धि से ‘असुरः’ ( मेघः ) मेघ ‘बृहच्छ्रवाः’ ( बृहद्घोषः ) बड़े शब्द से युक्त ‘कृतः’ कर दिया । अर्थात् जब इन्द्र ने मेघ पर वज्र मारा तो मेघ ने शब्द किया । यह भी निगम है । इस प्रकार यहां शब्द की समानता और असुर के सम्बन्ध से ‘बर्हणा’ शब्द ‘परिबर्हणा’ के अर्थ में है ॥ ३ ( १८ ) ॥ ३८