भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 737

हिन्दी निरुक्त ( ३२४ ) ६ अ० ५ पा० ४ खं० 'अश्विनो !' ( अश्विनौ ! ) हे अश्विन् देवो ! 'वृकेण (लाङ्ग- लेन ) हलसे 'यवम्' यव (जव ) आदि धान्य को ' वपन्ता ' ( वपन्तौ-इव ) बाते हुए जैसे [ जब अश्विन् देवता वर्षा करने का बड़ा अनुग्रह करते हैं,तभी हलके कर्म की फलसिद्धि होती है, इसी से उनको हलसे बीज बोने का विशेषण दिया गया है, वास्तव में सब प्रकार हल कर्म उनके अधीन है, यह यहां स्तुति है । ] 'इषम्' ( अन्नम् ) अन्न को 'मनुषाय' मनुष्यके लिये 'दुहन्ता' (दुहन्तौ दोहते हुये-पूरते हुये 'दस्रा' (दस्त्री- दासयितारौ ) शत्रुओं के नाश करने वाले ' अभिदस्युम् ' ( दुर्भिक्षम् ) दुर्भिक्ष-अकाल को ' बकुरेण ' ( ज्योतिषो वा उदकेन वा ) ज्योति से अथवा जलसे ' धमन्ता ' ( धमन्तौ ) नाश करते हुये 'आर्याय' ( ईश्वरपुत्राय-ऋज्राश्वाय ) ऋज्रा- श्व के लिये ( युवाम् ) तुम दोनों ने 'उरु' ' ज्योतिः ' बहुत प्रकाश 'चक्रथुः' किया था । ( क्योंकि जब वह अन्धा होगया था, तब तुम दोनों ने उसे नेत्रवान् बनाया था । ) इस प्रकार यहां अर्थ के अनुरोध से 'बकुर' शब्द उदक ( जल ) समूह या ज्योति के समूह का वाचक होता है । 'वृक' क्या ? लाङ्गल हल होता है । क्यों ? विकर्त्तन- छेदन करने से । ' लाङ्गल ' शब्द 'लङ्ग' ( भ्वा०प० ) धातु से है । क्योंकि- वह पृथ्वी में लगता है । अथवा लाङ्गूलवत्—पूंछवाला होने से लाङ्गल है । 'लाङ्गूल' शब्द संगार्थक 'लग' ( भ्वा०प०) धातु से है। अथवा उसी अर्थ में 'लङ्ग' ( भ्वा० प० ) धातुसे है । लटकना अर्थ में 'लम्ब' ( भ्वा०,आ० ) धातु से है ।