निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२५ ) ६ अ० ५ पा० ४ खं० 'दस्र' क्या ! दर्शनीय अथवा शत्रुओंके नाशकरने वाले । 'आर्य' क्या ? ईश्वर-राजा का पुत्र-ऋज्राश्व । 'बेकनाटाः' ( १०६ ) यह अनवगत है ' बेकनाट कौन होते हैं ? 'कुसीदिनः' वृद्धिजीवी-व्याज से जीने वाले--जो दूसरों को अपना रुपया देकर समय के परिमाण पर मूल से कुछ अधिक लेना ठहरा लेते हैं,और फिर व्याजका व्याज लगा कर मूल से उस द्रव्य को द्विगुण कर लेते हैं। अथवा द्विगुणादा- यी -धन की वृद्धि के लोभ से अपने मूल धन को जो दूसरों में ही रखते हैं,उन्हें धन आताही दिखाई देताहै किन्तु वास्तव में वे अपने धन को कभी दे बैठते भी हैं, अथवा द्विगुण-दुगुने धन की कामना वाले होते हैं । “ इन्द्रो विश्वान्बेकनाटाँ अहर्दृश उत्क्रत्वा पर्णी रभि । ”अर्थात्-(यः) 'इन्द्रः' जो इन्द्रदेव 'विश्वान्' सब 'बेकनाटान्' ( कुसीदिनः ) व्याज खाने वालों अतएव 'अहर्दृशः' इसी जन्म में सूर्य को देख लेने वाले,किन्तु पाप के प्रभाव से जन्मान्तरों में अन्धकारमय नरक में जाने वाले व्यव- हारी जनों को अथवा जो अज्ञान के कारण विषय भोग में डूबे हुये इन्हीं दिनों को देखते हैं किन्तु आगे आने वाले दिनों को नहीं, ऐसे नास्तिक जनोंको तथा 'पणीन्' (वणिजः) वाणिज्य करने वालों को 'अभि-भवति' नाशकरता-दण्डित करता है। इस प्रकार यहां 'बेकनाट' शब्द अर्थ के अविरोध के कारण कुसीदी-व्याज खाने वाले का नाम है ॥ इस मन्त्र से यह उपदेश मिलता है कि राजा को अपने राष्ट्र की आर्थिक दशा को सुरक्षित रखने के लिए वृद्धिजी- वी या व्यापारी लोगों पर तीव्र दृष्टि रखनी चाहिये ॥४(२६)॥