निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( ३२७ ) ६ अ० ५ पा० ५ खं०
अभिगच्छन्-अंहस्वान् भवति । स्तेयं, तल्पारोहणं,
ब्रह्महत्यां, भ्रूणहत्यां, सुरापानं, दुष्कृतस्य कर्मणः
पुनः पुनः सेवां, पातके अनृतोद्यम्-इति ।
'बत(:)'-इति निपातः खेदानुकम्पयोः ॥५(२७)॥
'अभिधेतन' (११०) यह अनवगत 'अभिधावत' (सम्हालो) के अर्थमें है ।
"जीवान्नो" मन्त्र के जाल में फंसे हुये मत्स्य ऋषि है, गायत्री छन्द
और आदित्य देवता है ।
अर्थः—'आदित्यासः' हे आदित्य देवो ! तुम 'जीवान्
नः' ( जीवतः नः ) जीते हुये हम को 'हथात्' ( हननात् )
मरने से 'पुरा' पहिले 'अभिधेतन' ( अभि-धावत ) सम्हालो ।
'हवनश्रुतः !' ( ह्वानश्रुतः ' ) हे आह्वान-बुलावे के सुनने
वालो ! 'कत्-ह-स्थ' ( क्व नु स्थ ) तुम कहां हो-जिस से कि
न सुनते ही हो और न आते ही हो । इस प्रकार यहां 'पुरा-
हथात्'-( मारने मरने से पहले ) के सम्बन्ध से 'अभिधेतन'
शब्द 'अभिधावत'-आओ-दौड़ो के अर्थ में है !
इस मन्त्रको जालमें पकड़े हुए मत्स्यों (मछलियों) का आर्ष
बताते हैं । क्योंकि मन्त्रमें जो आवेदन-प्रार्थना करनेवाला होता
है, वही ऋषि होता है, इस नियम के अनुसार इस मन्त्र में
आदित्यों से आर्त्त मत्स्य पुकार करते हैं, इसी से उन का
ऋषि होना सिद्ध होतो है ।
इस उदाहरण से वेद की नित्यता भी प्रतीत होती है
क्यों कि-वेद मन्त्र नित्य शब्दों से नित्य अर्थ को ले कर
प्रवृत्त होते हैं । यदि किसी समय-विशेष में वेद
का निर्माण होता तो मत्स्य ऋषियों को पुकार
की क्या अपेक्षा होती, जब कि-पुरुष ऋषियों का ही