निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२८ ) ६ अ० ५ पा० ५ खं० यथेष्ट लाभ होता । अतः मत्स्य ऋषिके समान वसिष्ठ आदि ऋषि भी मन्त्रों में नित्य शब्द के रूप ही में हैं, किन्तु किसी समय विशेष में होने वाले ऋषि नहीं । मन्त्र स्वतन्त्र हैं वे जिस प्रकार चाहते हैं, उपादेय अर्थ को प्रकाश कर देते हैं- कहीं मत्स्य, कहीं सर्प, कहीं ओषधि और कहीं वसिष्ठ आदि से । 'मत्स्य' क्यों ? मधु-जलमें स्यन्दन-करते बहते हैं । अथवा आपस को खाने को मद-प्रमाद करते हैं । 'जास' क्या ? जलचर-जलमें विचरने वाला होता है । अथवा जलमें होने वाला । अथवा जलमें सोने वाला । 'अंहुर' अंहस्-वान्-पापवान्-पापी होता है । 'अंहूरण' शब्द भी इसी 'अंहस्-वान्' का होता है । “कृण्वन्नंहूरणादुरु” अर्थात्- 'अंहूरणात्' पापरूप कूप में पड़ने से उद्धार करके 'उरु' बहुत कल्याण 'कृण्वन्' करते हुये [बृहस्पति देवने त्रितकी पुकार को सुना] । यह भी निगम होता है । यहां अर्थ के अनुरोध से 'अंहूरण' नाम पापयुक्त का है । 'अंहुर' का उदाहरण- “सप्त मर्यादाः कवय स्ततक्षुस्तासामेकामि- दभ्यंहुरागात् ” अर्थात्- 'कवयः' (मेधाविनः-हिरण्यगर्भ मनुप्रभृतयः) कवियों-मेधावियों-ब्रह्मा, मनु आदिकों ने 'सप्त' मर्यादाः' सात मर्यादाएं 'ततक्षुः' (चक्रुः) की हैं। 'तासाम्' उन में 'एकाम्-इत्' (एकाम्-अपि) एक मर्यादा को भी 'अभि 'अगात्' (अभिगच्छन्) उल्लंघन करता लांघता हुआ