भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 744, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 744

हिन्दी निरुक्त ( ३३१ ) ६ अ० ५ पा० ६ खं० को हम नहीं जानते । अथवा-मैंने तेरा अभिप्राय पा लिया- “ अन्या किल त्वां परिष्वजाते-परिष्वङ्क्ष्यते ” दूसरी ही मुझसे उत्तम स्त्री तुझे आलिङ्गन करेगी-उससे मोहित हुआ ही तू मुझे आलिङ्गन करना नहीं चाहता । कैसे तुझे वह आलिङ्गन करेगी ? “ कक्ष्येव युक्तं लिबुजेव वृक्षम् ” कक्ष-बगल में उपजी हुई अच्छी बढ़ी बेल जैसे अपने पास वाले वृक्ष को चारों ओरसे लपेट लेवे । इस प्रकार 'बतः' यह निपात खेद् और अनुकम्पा-दया अर्थमें है । ऐसे ही प्रकरण संगत होता है । 'बत' क्या ? बलसे अतीत-अलग-दूर गया हुआ-दुर्बल होता है । ' लिबुजा ' व्रतति-लता-बेल होती है । क्यों ? लप हो जाती है विभक्त-न्यारी होती हुई भी । ' व्रतति ' क्यों ? वरणा-स्वीकार- कर लेने ढांपलेने से । और शयन-सोजाने से । और ततन-फैलजाने से । ' वाताप्य ' (११३) ( अनवगत ) उदक-जल होता है । क्योंकि-वह वात-पवन से आप्यायन होता-बढ़ाया- लाया जाता है । “ पुनानो वाताप्यंविश्वश्चन्द्रम् ” हे सोम ! तू ' विश्वः ' सब का सब 'चन्द्रम्' चमकीले-स्वच्छ 'वाताप्यम्' जलको प्राप्त होकर पत्ता हुआहुआ [नृमन्तं-] 'पुनानः'पुत्र पौत्र सहित यजमान को पवित्र करता हुआ । यह भी निगम है। इस प्रकार यहां अर्थ और शब्द के सादृश्य से 'वाताप्य' जलका नाम है ।