भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 745, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 745

हिन्दी निरुक्त ( ३३२ ) ६ अ० ५ पा० ६ खं० 'चाकन्' (११४) यह अनवगत 'चायन्-'पश्यन्' देखता- हुआ) के अर्थ में अथवा 'कामयमानः' ( इच्छा करता हुआ) के अर्थ में है । “वने न वायो न्यधायि चाकन् "हे इन्द्र ! 'वने' 'न' (वृक्षे इव) वृक्षमें जैसे पक्षी शिशु-जिसके पांख नहीं जामी हों, 'वायः' अपने बच्चे को 'न्यधायि' (निदधाति) रख देता है । सो जैसे वहां-घोंसले में रखा हुआ 'चाकन्' (पश्यन्) भयसे चारों ओर दिशाओं को देखता हुआ रहता है,। अथवा रक्षक की कामना करता हुआ रहता है । इस प्रकार यहां 'चाकन्' शब्द 'चायन्' (देखता हुआ) या 'कामयमानः' (कामना करता हुआ) के अर्थ में है । 'वायः क्या ? 'वेः पुत्रः' वि-पक्षी का पुत्र । शाकल्य मन्त्रोंके पदकार ने 'वायः' शब्द के 'वा' और 'यः' ये दो पद किये हैं। किन्तु यदि ऐसा होता तो 'न्यधायि' यह तिङन्त- आख्यात पद उदात्तस्वर वाला होता, क्योंकि-“ यद्वृत्ता- न्नित्यम् ” (पा० सू० ८, १, ६६) अर्थात्- 'यद्' शब्द के के प्रयोग के अनन्तर तिङन्त पद कभी निघात-अनुदात्त नहीं होता । इस नियम के अनुसार शाकल्य के मतमें 'यद्' शब्दके 'यः' रूपसे पर 'न्यधायि' आख्यात पद होता है, इस से यह अनुदात्त न होकर उदात्त होना चाहिए था परन्तु यह उदात्त नहीं बल्कि- अनुदात्त है। दूसरा कारण भाष्यकार यह भी बताते हैं कि- “ अमुसमाप्तश्च अर्थः ” अर्थ भी अधूरा रहता है । 'रथर्यति' (११५) यह अनवगत 'रथ इर्यति' (रथ या रहस्य या गमन की इच्छा करता है) के अर्थ मे है । अथवा रथ की कामना वाले के अर्थ में है ।