भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 746, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 746

हिन्दी निरुक्त ( ३३३ ) ६ अ० ६ पा० १ खं० 'रथर्यति' । सिद्धः-बनाहुआ ( सोम ) ' रथर्यति' ( तत्प्रे- प्सुर्भवति ) उस-रथ रंहण - गमन की इच्छावाला होता है। या रथकी कामना करता है । (यह नामधातु की क्रिया है । ) “एष देवो रथर्यति” ' एषः ' यह ' देवः ' सोम देव 'रथर्यति' रथ की या गमन की इच्छा करता है- यह भी निगम है । 'असक्राम्' (११६) यह अनवगत 'असंक्रमणीम्' ( नहीं संक्रमण करने वाली ) के अर्थ में है । “धेनुं न इषं पिन्वतमसक्राम्” हे अश्विन् देवो! 'नः' हमारे लिये 'असक्राम्' हम से कभी अलग न होने वाली 'धेनुम्' गो को और 'इषम्' अन्न को 'पिन्वतम्' तुम दोनों भराओ या बढ़ाओ । इस प्रकार यहां शब्द के सारूप्य और अर्थ के अविरोध से 'असक्राम्' यह 'असंक्रमणीम्' ( अलग न होने वाली ) के अर्थ में है ॥ ६ ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते षष्ठाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥६,५॥ षष्ठः पादः । ( खं० १ ) निघ०-आधवः ॥११७॥ अनवब्रवः ॥ ११८ ॥ निरु०—'आधवः' आधवनात् । “मतीनां च साधनं विप्राणां चाधवम् ।” (७,