भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 747, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 747

हिन्दी निरुक्त ( ३३४ ) ६ अ० ६ पा० १ खं० ७, १३, ४) इत्यपि निगमो भवति । ‘अनवब्रवः’ अनवक्षिप्तवचनः । “विजेषकृदिन्द्र इवानवब्रवः ।” [ ऋ० सं० ८, ३, १९, ५ ] । इत्यपि निगमो भवति ॥१९(२९)॥ अर्थः-‘आधव’ (११७) कैसे ? ‘आधवन’-आकम्पन-सब ओरसे कँपाने से । “ मतीनां च साधनं विप्राणां चाधवम् ” हे देव ! पूषन् ! आदित्य ! हम तुझे मतिनों-प्रज्ञाओं- बुद्धियों का साधन-देने-वाला मानते हैं । क्योंकि-सूर्य के उदय होने से ही सब प्राणियों की बुद्धिएं प्रकट होती हैं । और मेधावी ब्राह्मणों का कँपाने वाला है। अर्थात् तू ऐसे अपनी गुण शालिता-अपने गुणों को दिखाता है, जिस प्रकार हृदय कांपते हुये वे तुझे स्तुति करते हैं। यह भी निगम होता है । इस प्रकार यहां शब्द की समानता और अर्थ की अनु- कूलता से ‘आधव’ नाम ‘आकम्पयिता’ ( कँपाने वाला ) के अर्थ में है । ‘अनवब्रव’ (११८) यह अनवगत ‘अनवक्षिप्तवचन ’ ( जिसके वचन का कोई खण्डन न कर सके ) - अखण्डनीय वचन के अर्थ में है। “ विजेषकृदिन्द्र इवानवब्रवः । ” हे मन्यु देव तू ‘इन्द्रः-इव ’ इन्द्र के समान ‘अनवब्रवः ’ अखण्डनीय वचन और ‘विजेषकृत् ’ विजय का करने वाला है। यह भी निगम है । इस प्रकार यहां ‘अनवब्रव ’ शब्द ‘अनवक्षिप्त- वचन के अर्थ में है ॥ १ ( २६ ) ॥