निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३७ ) ६ अ० ६ पा० २ खंड० ‘ अरायि ! ’ सम्बोधन दियागया है । ) हे ‘ काणे ! ’, मन्द नेत्र वाली ! [ क्योंकि-दुर्भिक्षसे पीडित जनों की दृष्टि मन्द हो जाती है । ] ( अलक्ष्मी के पक्षमें भी काणी अलक्ष्मी प्रतीत होती है । क्योंकि = लोकमें भी विरूप स्त्री को अलक्ष्मी कहते हैं ।) हे ‘विकटे !’ विकट गति वाली ! [ क्योंकि-दुर्भिक्ष से दुर्बल हुए प्राणियों की गति विकट होजाती है । ] [ अलक्ष्मी पक्षमें वह विकट-रूपा प्रतीत होती है । ] ‘सदान्वे ²’-सदा नोनुवे ? -सदा प्राणियों को रुलाने वाली ? (क्योंकि-दुर्भिक्ष में भूख के मारे पीडित प्राणी हैंकते हुए सदा शब्द करते हैं । तू ‘ गिरिंगच्छ ’ पहाड़ पर चली जा । “ शिरिम्बिठस्य ( मेघस्य ) तैः सत्वाभिः (उदकैः) त्वा चातयामासि ( नाशयामः ) मेघ के उन जलों से तुझे हम नाश करते हैं । अथवा “ शिरिम्बिठस्य (भारद्वाजस्य) सत्वाभिः नामभिः तेभिः त्वा चातयामासि ” भारद्वाज ऋषि के देखे हुए स्तुतियुक्त नामों से हम तुझे नाश करते हैं । इस प्रकार यहां ‘ सदान्वे ’ पद ‘ सदानोनुवे ’, ( शब्द कराने वाली ! ) के अर्थ में है । इस मन्त्र में ‘अरायि’ ( १ ) ‘काणे’ ( २ ) ‘विकटे’ ( ३ ) ‘सदान्वे’ ( ४ ) स्त्री लिङ्ग सम्बोधन पद हैं । उनमें पहिला ‘अरायि’ पद दानार्थक ‘रा’ (अदा०प०) धातुका ‘णिन्’ प्रत्यय के संयोगसे ‘रायि’ होता है । जैसे दानार्थक ‘ दा ’ (जु०उ०) धातु का ‘ दायि ’ होता है । उसी का निषेध ‘ अरायि ’ है, जिसका लोक में स्त्रीलिङ्ग रूप ‘अरायिनी’ और सम्बोधन में उसी का ‘ अरायिनि ’ तथा ‘ दा ’ धातु का उसी प्रकार