निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३८ ) ६ अ० ६ पा० २ खं० 'अदायिनि' होता है, जैसा कि-भाष्यकार ने कहा है । २ रा 'काणा' और ३ रा 'विकटा' शब्द लोक-प्रसिद्ध हैं । ४ र्थ 'सदान्वे' अनवगत मूल शब्द है ही, जिस का यह प्रकरण और निगम है । इस मन्त्र में शिरिम्बिट्ठ ऋषि इन चारों सम्बोधनों से दुर्भिक्ष की पूर्णरूप से मूर्ति और उससे प्राणियों पर जैसी जैसी विपत्तिये' आती हैं, उन सबका यथार्थ रूप से अनुभव कर रहा है। तथा उसके निवारण का उपाय प्राधान्य से जल सम्पत्तिको देख रहा है । ' काण > क्या ? विक्रान्तदर्शन या उसका दर्शन-देखना विक्रान्त-विकट-तीव्र होता है । क्योंकि दोनों नेत्रों की ज्योति एक स्थानमें इकट्ठी हो जाती है । अथवा सन्धिके भेदसे 'अवि- क्रान्तदर्शन है। क्योंकि उसकी दृष्टि मन्द होजाती है। यह औप- मन्यव आचार्य मानते हैं ( ये दोनों अर्थ एक ही वाक्य से निकलते हैं और वह औपमन्यव का ही मत है । भाष्य के पाठ में सन्धि दोनों प्रकार की निकलती है-विक्रान्त और अविक्रान्त । दोनों ही निर्वचन अपने अपने ढङ्ग से अर्थ में घट जाते हैं । ) अथवा अणुभाव-छोटा होना अर्थ में 'कण' (स्वा० प०) धातु से है। अर्थात् सूक्ष्म-बारीक श्यामाक-सामक आदि अन्न 'कण' कहलाता है और उस की समानता से अल्प दर्शन या दृष्टि को मन्दता के कारण पुरुष 'काण' कहलाता है । अथवा 'कण' धातु शब्द के अणुभाव-अल्पता में बोला जाता है, जैसे अनुकणति (कुणारता है), और मात्रा के अल्प या थोड़े पन से 'काण' बोला जाता है । पहिले मत