निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३६ ) ६ अ० ६ पा० २ खं० में कण धातु अपने मुख्य अर्थ को और दूसरे मत में गौण अर्थ को लेकर 'काण' शब्द में उपयुक्त होता है। 'विकट' क्या ? विक्रान्त गति-जिस की गति विकृत बिगड़ी हुई हो, यह औपमन्यव आचार्य मानते हैं। अथवा 'वि' (उप०) सहित 'कुट' (तु० प०) धातु का है। क्यों ? वह 'विकुटित' कुबड़ा होता है। 'शिरिम्बिठ' क्या ? मेघ । 'बिठ' क्या ? अन्तरिक्ष-आकाश। 'बिठ' की व्याख्या 'बीरिट' (अ० ५ पा० ४ खं० ६) से की गई जानना । अथवा 'शिरिम्बिठ भारद्वाज ऋषि है। उस ने इस काल कर्ण सूक्त से युक्त हो-अनुष्ठान कर अलक्ष्मी-दरिद्रा को नाश किया था। अब भी दारिद्रय से दुखा हुआ पुरुष ठोड़ी समान जलमें घुसकर इस सूक्त का जप करके दारिद्र्य से मुक्त हो सक्ता है। 'शातयति' नाश करना अर्थ में है ! 'पराशर क्या ? पराशीर्ण-स्थविर-बुड्ढे वसिष्ठ ऋषि के यहां जन्म लिया था। “पराशरः शातयातु र्वसिष्ठः” हे इन्द्र ! ‘पराशरः’ पराशर 'शातयातुः शत्रुओ राक्षसोंका पातन करने वाला- मारने वाला और वसिष्ठः' वसिष्ठ (लेकि मैत्रीको नष्ट नहीं करते) । यह भी निगम है। इस प्रकार यहा ऋ ष 'पराशर' है, क्यों, कि- वसिष्ठका सम्बन्ध है। इन्द्र भी 'पराशर' कहलाता है। क्यों ? वह यातुओं का यातयितव्यो का-असुर आदिकों का 'परा' सब प्रकार शात- यिता नाश करने वाला है।