भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 753

हिन्दी निरुक्त ( ३४० ) ६ अ० ६ पा० ३ खं० “इन्द्रो यातृना मभवत्पराशरः ” ‘ इन्द्रः ’ इन्द्र देव ‘यातूनाम्’ राक्षसों का ‘पराशरः’ बड़ा नाश करने वाला ‘अभवत्’ हुआ । यह भी निगम है ॥ ‘ क्रिविर्दती ’ ( १२२ ) अनवगत शब्द ‘विकर्तन-दन्ती’ ( काटने वाले दांतों वाली ) के अर्थ में है । “ यत्रा वो दिद्युद्रदति क्रिविर्दती ” अर्थात्- ‘यत्र’ जिस मेघमें ‘ क्रिविर्दती ’ काटने में समर्थ दांतों वाली ‘दिद्युत्’ (आयुध-विशेष) ‘रदति’ काटती है । यह भी निगम है । यहां अर्थ के अनुसार ‘ क्रिविर्दती ’ शब्द आयुध का नाम है ॥ ‘करूलती’ ( १२३ ) अनवगत ) शब्द ‘कृत्तदती’ ( कटे हुये दांतों वाली ) के अर्थ में है । अथवा किसी कटे हुये दांतों वाले देवता को देखकर ऋषि ने ऐसा कहा है- ॥ २ ( ३० ) ॥ ( खं० ३ ) निघ०-दनः ॥१२४॥ शरारुः ॥१२५॥ इदंयुः ॥१२६॥ निरु०-“ वामं वामं त आदुरे देवो ददात्वर्यमा । वामं पूषा वामं भगो वामं देवः करूलती ॥ ” (ऋ० सं० ३, ६, २३, ४ ) ‘वामं’ वननीयं भवति । ‘आदुरिः’ आदरणात् ।