निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४२ ) ६ अ० ६ पा० ३ खं० सो वो 'अर्यमा-देवः' अर्यमा देव तुझे 'ददातु' देवे । अथवा अर्यमा देव अपने प्यारे धन को हे यजमान ! तुझे दे । 'पूषा वामं ददातु' पूषा देव तुझे वाञ्छनीय धन दे । ' भगः वामं ददातु' भग देव तुझे वाञ्छनीय धन दे । 'करूलती देवः वामं ददातु ' करूलती कटे दांत वाली देवता तुझे वाञ्छनीय धन दे । यहां ' करूलती ' यह पद कटे हुए दांत रूप गुण को बोधन करता है, अतः विशेषण शब्द है, किसी देवता का नाम नहीं, और इसी मन्त्र में इससे पूर्व 'भग' 'पूषा' ये भिन्न भिन्न देवताओं के नाम आये हैं, इस से यह सन्देह का स्थान होने से विचार किया जाता है कि “ ततः करूलती ” सो कौन 'करूलती' है, भग या पूषा ? एकमत है-“ भग” । क्योंकि-‘करूलती पद से पूर्व समीप में 'भग' ही पढाहुआ है इससे प्रतीत होता है कि-‘करूलती' 'भग' को ही कहा गया है 'करूलती' पदसे उसी को अन्वादेश-फिर स्मरण किया गया है । दूसरा मत है कि-‘करूलती' पूषा देवता को कहा गया है । क्योंकि-वह अदन्त-बिना दांत का है । यह कहां से जाना गया कि-पूषा अदन्त है ? “ अदन्तकः पूषा ” पूषा अदन्त है, यह ब्राह्मण ग्रन्थ है । प्राशित्र भाग के ब्राह्मण में इसका पूरा इतिहास ऐसा सुनाजाता है- “ तत् पूष्णे पर्य्याजह्रुः, तत् पूषा प्राश्नात्, तस्य