निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४३ ) ६ अ० ६ पा० ३ खं० दतो निर्जघान, तस्मादाहुः- अदन्तकः पूषा” वह हविः पूषाको दिया गया, पूषाने उसे खालिया, उस के दांत तोड़ दिये गए, इस कारण पूषा अदन्त है, ऐसा कहते हैं। इससे जिन्होंने समीपता मात्रके कारण भग को 'करूलती' कहा, सो ठीक नहीं है। क्योंकि-कहा भी है- “यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थमपि तस्य तत् । अर्थतो ह्यसमर्थानामानन्तर्यमकारणम् ॥” अर्थात्- जिस पदका जिस पदके साथ अर्थ-सम्बन्ध है- अर्थ जुड़ता है, वह दूर पढ़ाहुआ भी पद उसीका है। क्योंकि- अर्थ से असमर्थ सम्बन्ध न रखने वाले पदों का आनन्तर्य- निकट होना कारण नहीं-सम्बन्ध का हेतु नहीं ॥ 'दनः' (१२४) यह अनवगत 'दानमनस' ( दान में मन रखने वाले ) के अर्थ में है। “दनो विश इन्द्र मृध्रवाचः” 'इन्द्र' हे इन्द्र ! देव ! हमारे लिये 'विशः' ( मनुष्यान् ) मनुष्यों को 'दनः' ( दानमनसः ) देनेके मन वाले और 'मृध्र- वाचः' ( मृदुवाचः ) मीठी वाणी वाले ( कुरु ) कर । 'शरारुः' (१२५) यह अनवगत 'सशिशरिषु.१'-'मुमूर्षु.२' ( मरने की इच्छा वाला ) के अर्थ में है- “अवीरामिव मामयं शरारुरभिमन्यते । उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मा- दिन्द्र उत्तरः ॥” इस ऋचा का इन्द्र देवता, इन्द्रपत्नी ऋषि, और पङ्क्ति छन्द है । इन्द्रपत्नी कहती है-'अयं शरारुः'-( बालः-मूर्खः-