भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 757

हिन्दी निरुक्त ( ३४४ ) ६ अ० ६ पा० ३ खं०


संशिशरिषुः-सुमूषुः ) यह बालक-अज्ञान-मरने की इच्छा वाला-मूढ 'माम् अवीराम्-इव मन्यते' मुझे अवीरा-बिना वीर की अबला जैसी मानता है। यह इसकी अत्यन्त ही क्षुद्र मति है। किन्तु 'उत' वास्तव में 'अहम् वीरिखी अस्मि' मैं वीरिखी-वीर वाली इन्द्रपत्नी हूं। 'इन्द्रः मरुत्सखा विश्व- स्मात् उत्तरः' इन्द्र मरुतों का मित्र और संसार में सबसे बड़ा बलवान् या प्रभुके गुणोंसे ऊंचा है। इस प्रकार यहां 'शरारु' शब्द 'संशिशरिषुः' ( शरीर को छोड़ने की इच्छा वाला ) के अर्थ में है। इस मन्त्र में जिस अत्याचारी पर इन्द्राणी क्रोधाग्नि उगल रही है, वह नहुष राजा या और कोई हो सकता है। क्योंकि-नहुष ने भी किसी समय इन्द्राणी पर आक्रमण करना चाहा था, यह आख्यान पुराणों में भी मिलता है। यह मन्त्र इन्द्राणी के द्वारा पतिव्रता के दृढ भावों को सूचित करता है, इस लिये स्त्रियों को यह बड़ा आदरणीय तथा हृदय में रखने योग्य है। जिस प्रकार हिन्दुस्थान में हिन्दुओं के इतिहासों में पुराणों में और प्राचीनतम कालसे अद्य पर्यन्त हिन्दू स्त्रियों में सतीपना देखागया और देखा जाता है, वैसा ही वेद मन्त्रों में भी अधिकता से मिलता है। इस से ऐसा समझने का किसी को अवसर न होगा कि-स्त्रियों का पातिव्रत्य धर्म किसी समय विशेष में गढ लिया गया होगा। सुतराम् हिन्दू स्त्रियों का यह पातिव्रत्य धर्म वैदिक और अनादि है। 'इदंयुः' (१२६) यह अनवगत पद अनेक़ार्थ है—इसके अनेक अर्थ हैं। 'इदंयुः' क्या ? 'इदं कामयमानः' (इस की कामना करने वाला) होता है। यहां 'इदम्' यह पद वाञ्छित वस्तु