निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४५ ) ६ अ० ६ पा० ४ खं० मात्र के लिये है, अर्थात्-कामना या प्रार्थना करने वाले को ‘इदंयु’ कहाजाता है । 'यु' शब्द कामना अर्थ में प्रसिद्ध नहीं इसका बोल चालमें बहुत प्रयोग नहीं होता है, इस कारण 'इदंयु' शब्द अनवगत है । और भी 'तद्वत्' (उस वाले) के अर्थ में बोला जाता है-हिन्दी में जहाँ 'वाला' शब्द जोड़ा जाता है-जिस अर्थ के लिये कहा जाता है, संस्कृत में उसी प्रयोजन के अर्थ 'यु' शब्द दिया जाता है । जैसे “वसूयुरिन्द्रः” यहां ‘इन्द्र वसूयु अर्थात् वसुमान् = वसुवाला = धनवाला है ऐसा अर्थ होना है। क्योंकि परिपूर्ण इन्द्रमें वसुकी कामना का संभव नहीं इस से यहां 'यु' तद्वत् अर्थ में है । “अश्वयु र्गव्यू रथयुर्वसूयुः” ‘इन्द्रः’ इन्द्र ‘अश्वयुः’ घोड़े वाला ‘गव्युः’ गोवाला ‘रथयुः रथवाला और ‘वसूयुः’ धनवाला है । यह भी निगम है । इस प्रकार इस निगम में 'अश्वयु' (अश्ववाला) आदि शब्दों में अनेक बार 'तद्वत्' के अर्थ में 'यु' शब्द का प्रयोग आया है । यहां ये सब इन्द्र के विशेषण हैं, अतः कामना का संभव न होने से 'तद्वत्' का अर्थ ही लिया जासकता है । ३ ( ३१ ) ॥ ( खं० ४ ) निघ०-कीकटेषु ॥१२७॥ बुन्दः ॥१२८॥ निरु०-“किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावो नाशिरं दुह्रेन तपन्ति घर्मम् । आनो भर प्रमगन्दस्य वेदो नैचाशाखं मघवन््रन्धया नः ॥” ( ऋ० सं० ३,३, २१, ४ ) ॥ ४४