भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

[Header] हिन्दी निरुक्त । ७७

धातुसे बनता है। 'शक्वरी' ऋचाका नाम है ('शक्' धातुसे बनता है। यह बात ब्राह्मणमें भी जानी गई है,-कि जो [इन्द्र] इनके द्वारा वृत्रको मार सका,—यही शक्वरी ऋचाओंमें शक्करीपन है। एक ब्रह्मा ऋत्विज् जब जब प्रायश्चित्त प्राप्त होता है, अन्य ऋत्वि- जोंके लिये अपने विज्ञानको कहता है। [क्योंकि—ब्रह्मा सब विद्या- ओंवाला है, इससे सबको जानने योग्य है। ब्रह्मा सब प्रका- रसे ज्ञान या श्रवणसे पूर्ण है। ब्रह्म (वेद) (न० लिं०) सब ओरसे परिपूर्ण है। और एक अध्वर्यु ऋत्विज् यज्ञको नाना प्रकारकी इतिकर्त्तव्यताको करता है। 'अध्वर्यु' नाम अध्वरयुका है, जो अध्वरको जोड़ता है, या अध्वरको समाप्ति तक ले जाता है, या अध्वरको करनेकी कामना करता है। अथवा 'अध्वर' शब्दमें अध्ययन करनेवाले अर्थ में 'यु' यह उपबन्ध वा प्रत्यय होता है। [जिससे 'अध्वरयु' नाम अध्वरके पढ़नेवालेका होता है।] 'अध्वर' नाम यज्ञका है। 'ध्वृ' धातुका हिंसा अर्थ है, उसीके निषेध का नाम 'अध्वर' है॥ कोई आचार्य 'त्व' शब्दको निपात बताते हैं। [आक्षेप] यदि निपात है, तो अनुदात्तस्वर नाम कैसे होगा ? [नहीं होगा]। प्रयोजन यह कि नाम माननेमें ही “फिषो- ऽन्त उदात्तः” [फि० १। २] प्रातिपदिकका अन्त उदात्त होता है। इस सूत्रके अपवाद “त्व त्वत्-सम-सिमेत्यनुच्चानि” [फि० ४, ६ त्वत्, त्व, सम और सिम ये शब्द अनुदात्त होते हैं,—इस सूत्रसे 'त्व' शब्द अनुदात्त सिद्ध होता है, जैसा कि होना चाहिये और निपात माननेमें “निपाता आद्युदात्ताः” [फि० ४, ११] निपा- तोंका पहिला स्वर उदात्त होता है,—इस सूत्रके अनुसार उदात्त ही रहेगा। दूसरे, विभक्तियोंके साथ इसमें विकार देखा जाता है, जो कि निपातोंमें सर्वथा नहीं है, इससे भी यह [त्व] नाम ही सिद्ध होता है। [जैसे] द्वितीया विभक्तिके एक वचनमें “उत्