निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६८ ) ७ अ० ६ पा० ६ सं० ( खं० ६ ) ( निरु० ) “समानमेतदुदकमुञ्चैत्यवञ्चाहभिः । भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः ॥” [ ऋ० सं० २, ३, २३, ५ ] इति सा निगद- व्याख्याता ॥९ ( २३ ) इति सप्तमाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ ७,६ ॥ अर्थ:- “समानमेतत्०” । ‘समानम्’ (एकमेव) एक ही ‘एतत्’ यह ‘उदकम्’ जल ‘अहभिः’ (अहोभिः निमित्त- भूतैः) विशेष दिनों से “उद्- एति च” ऊपर को जाता है अव एति च” और फिर विशेष दिनों से ही नीचे को आता है - दक्षिणायन और उत्तरायण के भेद से यहां दिन समझे गये हैं, सो ही यहां एक ही जल क्रम से उत्तरायण और दक्षिणायन में जगत् के निर्वाह के अर्थ वृष्टि के रूप से ऊपर को जाता है और नीचे को आता है, नीचे को किस प्रकार आता है, यह पहिले कहते हैं- “भूमिं पर्जन्याः” पर्जन्याः, (प्रार्जयितारो रसानाम् ) रसों के बढाने वाले मध्यम लोक के देवगण ( उस लोक से वर्षा को छोड़ते हुए ) ‘भूमिम्’ पृथिवी को ‘जिन्वन्ति’ तृप्त करते हैं (ओषधियों की उत्पत्तिके लिये)। अब ऊपर को कैसे जाता है, यह कहते हैं- “दिवं जिन्व- न्त्यग्नयः” [जिस प्रकार उस लोक से वर्षा के द्वारा पर्जन्य इस पृथिवी की तृप्ति करते हैं, वैसे ही- ] ‘अग्नयः’ अग्निाएं (आहुतियों से उत्पन्न हुई वृष्टि के द्वारा ‘दिवम्’ द्युलोक को