निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ६ पा० ६ सं० 'पिन्वन्ति' तृप्त करती हैं- अग्नि में आहुतियां छोड़ी जाती हैं, वे अग्नि से दग्ध होकर अग्नि की ज्वालाओं से जल के स्वरूप को प्राप्त करके बहुत सूक्ष्म देवत्आों के उपभोग के योग्य बनाकर द्युलोक में पहुंचाई जाती हैं- वहां के निवासि- यों की तृप्ति के अर्थ वृष्टिके रूप में पहुंचाई जाती हैं, फिर वे द्युलोकनिवासी यहां के अर्थ वृष्टि करते हैं। सो कहा भी है कि- “अमुष्य लोकस्य का गतिः इति, अयं लोक इति होवाच” इति। अर्थात्-‘उस (द्यु) लोक की क्या गति है उसका निर्वाह कहां से होता है, (उत्तर-) यह लोक-इस लोक की आहुतियों से, यह कहा’। इस प्रकार सर्वथा यह पार्थिव अग्नि भी वर्ष कर्म वाला है। क्यों कि सब वृष्टि का मूल आहुतियां हैं। जैसे कि स्मृति है- “अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्या ज्जायते वृष्टि र्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥” (मनुः अ० ३ श्लो० ७६) अर्थात्-‘अग्नि में विधि से छोड़ी हुई आहुति आदित्य को प्राप्त होती है, और आदित्य से वृष्टि वृष्टि से अन्न और अन्न से प्रजा होती हैं।' इस लिये जो कि, यह कहा है कि- वृष्टि कर्म के योग से “वैश्वानर” मध्यम ज्योति है, यह लक्षण अग्नि और आदित्य में भी साधारण है, अतः वर्ष कर्म के लिङ्ग से यह मध्यम नहीं हो सकता।] ‘इति सा०’ यह (समानमेतत्०) ऋचा अपने पाठ से ही व्याख्या की हुई है ॥ ९ (२३) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ ७,६ ॥