निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १०१ ) ७ अ० ६ पा० १ सं० ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, वृष्टिकाम की कारीरी ( इष्टि ) में अग्नि धामच्छद् के लिये अष्टाकपाल (पुरोडाश) होता है, उसकी पुरोनुवाक्या है, तहां मैत्रायणीयक में यह (पार्थिव) अग्नि आदित्य करके स्तुति किया जाता है । ‘कृष्णम्’ काले ‘नियानं’ (निरयणम्) मार्ग से ‘सुपर्णाः’ सुन्दर दौड़ने वाले ‘हरयः’ (हरणाः आदित्यस्य = आदित्य- रश्मयः) हरणशील आदित्य के हरि (रश्मिएं) “अपो- वसानाः” जलको धारण करते हुए ‘दिवम्’ द्युलोक को ‘उत्पतन्ति’ उड़ जाते हैं = चले जाते हैं– सूर्य भगवान् जब जगत् के अनुग्रह के लिये जल का गर्भ अपने में धारण करने की इच्छा से उत्तरायण में आते हैं, तब ये रश्मि इस सब लोक से जलको अपने में धारण करते हुए आदित्य मण्डल के प्रति उड़ते हैं, और उस जलको आदित्य मण्डल में धर देते हैं, फिर सूर्यदेव उत्तरायण के छः मास तक जलके गर्भ को धारण किये हुये रहते हैं, और दक्षिणायन में आकर आषाढ मास से प्रसव करते हैं–जलको बरसते हैं,–सो यह कहा जाता है–“ते आ ववृत्रन्॰” ‘ते’ (रश्मयः) वे रश्मिएं (यदा) जब (अमुतः) उस ‘ऋतस्यसदनात्’ (उदकस्य सहस्थानाद् आदित्यात्) जल के स्थान आदित्य मण्डल से ‘आववृत्रन्’ (अर्वाञ्चः पर्यावर्त्तन्ते) नीचे की ओर लौटते हैं, ‘ओत्’ (अथ) उस समय ‘घृतेन’ (उदकेन) जलसे ‘पृथिवी’ पृथिवी ‘व्युद्यते’ भीग जाती है ॥ ‘घृत’ यह जलका नाम है । ‘सिच’ (तु० प०) धातु के सेचन अर्थ में ‘घृ’ (जु० प०) धातु से है ।