निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १०२ ) ७ अ० ६ पा० १ ख० [ इस प्रकार इस मन्त्र में वर्षकर्म का करने वाला मन्त्र के अक्षरार्थ से आदित्य और प्रकरण से अग्नि है, दोनों ही प्रकार से वृष्टि का करने वाला मध्यम से अन्य है, अतः वर्ष- कर्म के योग से "वैश्वानर" मध्यम है, यह कहना अयुक्त है।] "अथापि ब्राह्मणम्०" और भी ( इस मन्त्र के अर्थ को पुष्ट करने वाला ) ब्राह्मण है-"अग्निर्वा०" 'अग्नि इस लोक से वृष्टि को प्रेरणा करता है- अग्नि की ऊष्मा के साथ ओषधि वनस्पतियों से धूम के रूप में जल आकाश की ओर उड़ते हैं फिर द्युलोक में मेघरूप होकर ( आदित्य ) बरसता है- (आकाश में) उसी आदित्य की रची हुई वृष्टि को मरुत् ( मध्यम लोक के देवगण ) यहां पहुंचाते हैं'। [ और भी ब्राह्मण- ] "यदासौ" जब वह आदित्य रश्मियों से अग्नि के प्रति लौटता है, तब बरसता है। [ इस प्रकार वृष्टिकर्म सब देवताओं का समान है, अतः यह "वैश्वानर" के मध्यम होने में हेतु नहीं होसकता ] । ( पूर्व याज्ञिक मत का खण्डन ) "यथो एतत्०" और जोकि-यह कहा "रोहात् प्रत्यवरोहः" 'रोहण के अनुसार प्रत्यवरोहण करना इष्ट है,- इत्यादि। यह आम्नाय (वेद) के वचन के प्रामाण्य से होता है। अर्थात्-तृतीय सवन में जो 'वैश्वानर के सूक्त' से शस्त्र का आरम्भ होता है, वह विधिवाक्य के अधीन किया जाता है। लोकों को आरोहण तथा प्रत्यवरोहण अर्थवाद मात्र = फलस्तुति मात्र है, उसका कोई विरोध नहीं है।