निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १०४ ) ७ अ० ६पा० २खं कारण नही )। क्यों कि- कपाल निर्वचन के साधक नही होते, व्यभिचारी है- यदि इनकी संख्या बारह ( १२ ) ही नियत होती, तो ऐसी कल्पना होती किन्तु स्वयम् सूर्य के एककपाल और पञ्चकपाल भी पुरोडाश होते है, "यथो एतद्०", और यह कहा कि- ब्राह्मण (आदित्य को वैश्वानर कहने वाला) है, (वह भी ठीक नहीं )। क्यों कि- ब्राह्मण बहुभक्ति के कहने वाले हैं- और भी बहुत अर्थों को वैश्वानर कहते है । (जैसे-) 'पृथिवी वैश्वानर है' सवत्सर वैश्वानर है, ब्राह्मण वैश्वानर है, । "यथा एतत्०" और जोयह कहा कि-सूर्य वैश्वानर की निविद् है (यह भी ठीक नहीं। क्यों कि-) इसी (पार्थिव अग्नि) की वह (निविद्) है [ऐसा उसके आद्यन्त पर्यालोचन से प्रतीत होता है] । [जैसे-] “यो विड्भ्यो मानुषीभ्यो दीदेत” जो मनुष्यों की जातियों के अर्थ प्रकाशित होता है । यही पार्थिव अग्नि मानुषी विटों (जातियों) के अर्थ जलता है । "यथो एतत्०" और यह कहा कि- सूर्यवैश्वानर का छन्दोमिक (छन्दोम यज्ञ = दाशरात्रिकों में) सूक्त है । वह इसी पार्थिव अग्नि) का है । [ जैसे- ) “जमदग्निभिरा- हुतः' अर्थात् - बहुत अग्नि वालों से या प्रज्वलित अग्नि वालों से होम किया गया है ([क्यों कि जमदग्नि इसी अग्नि में आहुतियों को देते हैं, किन्तु आदित्य में नही। यह विधि से और संभवसे सिद्ध है । अतः यह सूक्त भी इसी अग्नि का है । ]