निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १०५ ) ७ अ० ६ पा० ३ खं 'जमदग्नि' क्या ? प्रज्वलिताग्नि ( बहुत अग्नि वाले ) अथवा प्रज्वलिताग्नि ( जिनका अग्नि प्रज्वलित रहता है) ॥ “यथो एतद् हविष्पान्तीयम्” और जैसा कि यह कहा- सूर्य वैश्वानर का हविष्पान्तीय सूक्त है, वह भी इसी ( पार्थिव अग्नि ) का है । [ जैसा कि- ] ॥२(२४)॥ ( खं० ३ ) (निरु०-) “हविष्पान्तमजरं स्वर्विदि दिविस्पृ- श्याहुतं जुष्टमग्नौ । तस्य भर्मणे भुवनाय देवा धर्मणे कं स्वधयापप्रथन्त ॥” (ऋ०सं० ८,४,१०,१- १०,७,४,१) हविः यत् पानीयम् अजरम् सूर्यविदि दिविस्पृ- शि अभिहुतं जुष्टम् अग्नौ, तस्य भरणाय च भावनाय च धारणाय च एतेभ्यः सर्वेभ्यः कर्मभ्यः इमम् अग्निम् अन्नेन अपप्रथन्त- इति । अथापि आह ॥३(२५)॥ अर्थ :- “हविष्पान्तम्” इस सूक्त का मूर्द्धन्वान् आ- ङ्गिरस ( अङ्गिरा का पुत्र ) अथवा वामदेव ऋषि व्यूढ दश- रात्र के पञ्चम अहन् में आग्निमारुत ( शस्त्र ) की प्रतिपद् ( पहिली ऋचा ) है । ( यत् ) जो 'हविः' हवि 'पान्तम्' (पानीयम्) देवताओं के पान योग्य है, 'अजरम्' जिस से अधिक जरा या पाक न हो, अर्थात्-पूर्णरूप से पका हुआ है, 'स्वर्विदि' (सूर्यविदि)