निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १०६ ) ७ अ० ७ पा० ४ खं० सूर्य के जानने वाले 'दिविस्पृशि' द्यु या आदित्य को छूने वाले नित्य २ हविः को पहुंचाने के अर्थ आदित्य को स्पर्श करने वाले 'अग्नौ' अग्नि में 'आहुतम्' ( अभिहुतम् ) भले प्रकार होम किया हुआ या होम करने योग्य है, 'जुष्टम्' देवताओं का प्रिय है, 'तस्य' उस (हविः) के 'भर्मणे' (भरणाय) सम्भरणाय बढ़ाने के अर्थ, 'भुवनाय' ( भावनाय च ) पर्याप्ति या देवताओं की तृप्ति के उपयुक्त बनाने के लिये 'धर्मणे' ( धारणाय च ) और धारण के लिये सदा देवताओं के अर्थ प्रस्तुत रखने के लिये ( एतेभ्य सर्वेभ्यः कर्मभ्यः ) इन सब कर्मों के लिये ( इमम् अग्निम् ) इस पृथिवी स्थान अग्नि को 'देवाः' देवताओं ने 'स्वधया' ( अन्नेन ) अन्न से ( घृत, पुरो- डाश आदि से ) 'अपप्रथन्त' ( अवर्धयन्त ) बढ़ाया ॥ “अथापि आह” और भी कहता है-किसी दूसरे सूक्त से और ऐसा मन्त्र पढता है, जिस में मध्यम और उत्तम दोनों ज्योतियों से अन्य ज्योति को वैश्वानर कहा गया है ॥३(२५)॥ ( खं० ४ ) (निरु०-) “अपामुपस्थे महिषा अगृभ्णत विशो राजानमुपतस्थुर्ऋग्मियम् । आदूतो अग्निमभर- द्विवस्वतो वैश्वानरं मातरिश्वा परावतः ॥” ( ऋ०सं० ४,५,१०,४ ) ॥ अपाम् उपस्थे उपस्थाने महति अन्तरिक्षलोके आसीना महान्तः इति वा, अगृह्णत माध्यमिका देवगणाः विश इव राजानम् उपतस्थुः ऋग्मियम्