निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुर्मवन्तम्-इति वा, अर्चनीयम्-इति वा, पूजनीयम् इति वा अहरत्, यं दूतो देवानां विवस्वतः 'आदि- त्यात्। 'विवस्वान् विवासनवान्। प्रेरितवतः पराग- ताद् वा। अस्य अग्नेर्वैश्वानरस्य मातरिश्वानम् आहर्त्तारम्-आह। 'मातरिश्वा' वायुः मातरि अन्तरिक्षे श्वसिति मातरि आश्वनिति इति वा । अथ एनम् एताभ्याम् सर्वाणि स्थानानि अभ्या- पादं स्तौति ॥ ४ (२६) ॥ अर्थः-"अपामुपस्थे" इस ऋचा का भरद्वाज ऋषि और प्रातरनुवाक तथा आश्विन शस्त्र में शस्त्र है। "अपाम्-उपस्थे" (उपस्थाने = महति अन्तरिक्षलोके) जलों के रहने के स्थान बड़े आकाश देश में 'महिषाः' (आ- सीनाः) बैठे हुए (महान्तः इति वा) अथवा बड़े (माध्य- मिकाः देवगणाः) मध्यम लोक के देवगणों ने (तम्) उस को 'अगृभ्णत' (अगृह्णत) ग्रहण किया, 'ऋग्मियम्' (ऋग्म- न्तम् इतिवा) ऋचाओं से स्तुति वाले (अर्चनीयम्-इति वा- पूजनीयम्-इति वा) अथवा अर्चनीय अथवा पूज्य (उस) को "विशः राजानम्"- (इव) जैसे मनुष्य राजाको (उपस्थान करें) 'उपतस्थुः' उपस्थान किया (सत्कृत किया) [किस को ?] (यम्) जिस 'वैश्वानरम्' वैश्वानर 'अग्निम्' अग्नि को 'दूतः' (देवानाम्) देवताओं का दूत 'मातरिश्वा' वायु 'परावतः' (प्रेरितवतः = प्रेरितवरात्) बहुत प्रेरित हुये