निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्तं ( १०८ ) ७ अ० ७ पा० ५ खं ' ( परांगतोद्वे वा ) अथवा दूर गएं हुये 'विवस्वतः' ( आदि त्यात् ) विवस्वान् = आदित्य से 'आ अभरत्' ( आहरत् ) लाया था । “अस्य अग्नेः०” इस ( पार्थिव ) अग्नि वैश्वानर को लाने वाले मातरिश्वा ( वायु ) को कहता है—इस प्रकार इस मन्त्र में, जहां से लाया गया, जो लाया गया, और जो लाया तीनों अलग २ दिखाये हैं, अर्थात्—विवस्वान् से मातरिश्वा वैश्वानर को लाया । इस से इन दोनों विवस्वान् और मात- रिश्व के समीप में तीसरा 'वैश्वानर' शब्द से साक्षात् ही पार्थिव अग्नि कहा गया, इस लिये पार्थिव अग्नि वैश्वानर है, यह व्यवस्थित होता है । 'विवस्वान्' क्या ? विवासनवान् ( अन्धकार को हटाने वाला ) । 'मातरिश्वा' क्या ? वायु । क्यों ? माता = अन्तरिक्ष में श्वसन करता है = चलता है । [ इस व्याख्या में 'मातृ' शब्द और 'श्वस' ( अदा०प० ) धातु से 'मातरिश्वा' शब्द है । ] अथवा मातों अन्तरिक्ष में शीघ्र चलता है । [ इस व्याख्या में 'मातृ' शब्द 'आशु' (अव्यय) 'अन' (अदा०प०) धातु से है । ] अब इस ( अग्नि ) को इन दो ऋचाओं से सब स्थानों को लेलेकर स्तुति करता है ( ऋषि )—॥ ४ (२६) ॥ ( सं० ५ ) (निरु०–) “मूर्द्धा भुवो भवति नक्तमग्निस्ततः सूर्यो जायते प्रातरुद्यन् । मायामूतू यज्जियाना-