निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ११० ) ७ अ० ७पा० ६खं
यज्ञ के सम्पादन (सिद्ध) करने वाले देवताओं की 'मायाम्' (प्रज्ञाम्) माया या प्रज्ञान (विद्या) मानते हैं। 'यत्' जोकि-'अपः' (कर्म) अपने अधिकार के कर्म को 'जानन्' जानता हुआ 'तूर्णिः' (त्वरमाणः) वेग से युक्त 'चरति' (सर्वाणि स्थानानि अनुसंचरते) सब स्थानों (तीनों लोकों) को अनुसञ्चरण करता है-पर्यटन करता है-देवताओं में किसी कार्य की असंभावना नही करना। वे अपनी माया से अनेक२ वैसे २ ही रूप कर सकते हैं, जैसे २ की आवश्यकता हो । [मन्त्र में यहां “माया” शब्द साक्षात् है, जो पुराणों में बाहुल्य से आया है। यह शब्द देवकार्यों में असंभावना से दबे हुए मनुष्यों को ध्यान से देखना चाहिये । ] “तस्य उत्तरा०” उसी अर्थ को [ जो पूर्व ऋचा का है ] बाहुल्य से कहने वाली अगली ऋचा है-पहिली ऋचा से दो स्थानों के सम्बन्ध से अग्नि की स्तुति की गई है, कि- रात्रि के समय भूलोक का मस्तक होता है, और प्रातःकाल सूर्य के रूप से उदय होता है, और इस अगली ऋचा से तीनों लोकों के सम्बन्ध से स्पष्टतया स्तुति किया जाता है- यही अगली ऋचा का पूर्व ऋचा से आधिक्य है-॥५(२७)॥ ( खं० ६ ) [निरु०] “स्तोमेन हि दिवि देवासो अग्निम्- जीजनञ्छक्तिभी रोदसिप्राम् । तमू अकृण्वन् त्रेधाभुवे कं स ओषधीः पचति विश्वरूपाः ॥” [ऋ०म० ८.४.११.५] स्तोमेन हि यं दिवि देवा अग्निम् अजनयन्