निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (१११) ७ अ० ७ पा० ६ सं० शक्तिभिः कर्मभिः द्यावापृथिव्योः पूरणं तम् अ- कुर्वन्, त्रेधा भावाय । 'पृथिव्याम्, अन्तरिक्षे, दिवि',—इति शाकपूणिः । “यदस्य दिवि तृतीयं तदसावादित्यः” इति हि ब्राह्मणम् । तद् अग्नीकृत्य स्तौति । अथ एनम् एतया आदित्यीकृत्य स्तौति-॥६।२८॥ अर्थः- “स्तोमेन हि०” । 'देवामः' (देवाः देवताओँ ने 'स्तोमेन' स्तुतिभिः) स्तुतियों से 'दिवि' द्युलोक में 'अग्नि म्, अग्नि को 'अजीजनन्' (अजनयन्) उत्पन्न किया । 'शक्ति- भिः' (कर्मभिः) और कर्मों से 'रोदसिप्राम्' (द्यावापृथिव्योः पूरणम् ) द्युलोक और पृथिवी लोक में पूर्ण (कर दिया) । 'तम्' (एव) उसी (अग्नि) को “त्रेधा भुवे” (भावाय) तीन भागों में बांटने के अर्थ 'अकृण्वन्' (अकुर्वन् ) किया । ( पृथिव्याम्, अन्तरिक्षे, दिवि, इति शाकपूणिः ) पृथिवी में (अग्नि के रूप में) अन्तरिक्ष में (विद्युत् के रूप में) द्युलोक में (आदित्य के रूप में) [कर दिया] - यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं । “यदस्य०” 'जो इसका तीसरा (भाग) है, सो वोह आदि- त्य है'- यह ब्राह्मण है । “तद् अग्नी०” सो यह [उक्त ब्राह्मण] अग्नि मान कर स्तुति करता है- इस ऋचा में देवताओं ने इस पार्थिव अग्नि को ही द्युलोक में स्थापन किया और उसी को अन्य दो