निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ११२ ) ७ अ० ७ पा० ७ खं० लोकों में भी पूर्ण किया, सुतराम् यह अग्नि , विद्युत् और आदित्य सब अग्नि ही है, यह अग्नि की ही महिमा कही गई है । [पूर्व प्रकरण से इसकी यह संगति है कि- जब अन्य दोनों ज्योतिएं भी अग्नि ही हैं, तो वे "वैश्वानर" हैं, ऐसा जानना भ्रम है, और अग्नि का ही "वैश्वानर" मुख्य नाम है, यह सिद्ध हुआ ।] “अथएनम्” अब इस [अग्नि] को आदित्य करके स्तुति करता है-॥३[२८]॥ ( खं० ७ ) (निरु०) “ यदेदेनमदधुर्यज्ञियासो दिवि देवाः सूर्यमादितेयम् । यदा चरिष्णू मिथुनावभूता- मादित्प्रापश्यन् भुवनानि विश्वा ॥” ऋ० सं० ८, ४, १२, १] ॥ यदा एनम् अदधुः यज्ञियाः सर्वे दिवि देवाः सूर्यम् ‘आदितेयम्’ अदितेः पुत्रम् यदा चरिष्णू मि- थुनौ प्रादुरभूता सर्वदा सहचारिणौ उषाश्च आदि- त्यश्च । ‘मिथुनौ’ कस्मात् ? मिनोतिः श्रयतिकर्मा ‘थु’ इति नामकरणः, थकारो वा, नयतिः परः, वनिर्वा । समाश्रितौ अन्योन्यं नयतो, वनुतो वा मनुष्यमिथुनौ- अपि एतस्मादेव, मेथन्तौ अन्यो- न्यम् वनुतः इति वा ।