भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 882

हिन्दी निरुक्त ( ११३ ) ७ अ० ७ पा० ७ खं० अथ एनम् एतया अग्नीकृत्य स्तौति-॥७(२९)॥ अर्थः- 'यदेदेनम्०' । 'यदा' जब 'एनम्' इस 'आदिते- यम्' (अदितेः पुत्रम्) आदितिके पुत्र 'सूर्यम्' सूर्यको 'यज्ञियासः' (यज्ञिणः) यज्ञ के करने वाले 'सर्वे सब 'देवाः' देवताओं ने 'दिवि' द्युलोक में 'अदधुः' स्थापन किया, 'यदा' और जब 'चरिष्णू' [सर्वदा सहचारिणौ सब काल में एक साथ विचरने वाले 'मिथुनौ' दोनों मिथुन 'अभूताम्' हुये (उषाश्च आदि- त्यश्च)- उषा और आदित्य दोनों स्त्री पुरुष जुड़े हुये हुये 'आत्- इत्' [अथ तदा] उसी समय 'भुवनानि' लोकों ने 'पापश्यन्' (इन्हें) देखा ॥ इस मन्त्र में देवताओं ने द्युलोक में सूर्य को स्थापन कियो है ॥ 'मिथुन' कैसे ! सेवा अर्थ में 'मि' [स्वा० उ०] धातु 'थु' यह प्रत्यय अथवा 'थ' प्रत्यय और 'नी' (भ्वा० उ०) धातु पर है, अथवा 'वन' (त० आ०) धातु है । [ क्या अर्थ ? ] “समाश्रितौ अन्योन्यं नयतः” भली भांति आश्रित हुये हुये परस्पर को लेचलते हैं; अथवा 'वनुतः' चाहते हैं । मनुष्यों का मिथुन (स्त्री पुरुष का जोड़ा) भी इसी व्याख्यान से है । “मेथन्तौ अन्योन्यं वनुतः इति वा” आपस में लगे हुये परस्पर को लेचलते हैं या चाहते हैं । पूर्व पक्ष में 'मि- थु- नी' का अथवा 'मि- नी- थु' का 'मिथुन' शब्द बना, और दूसरे पक्षमें 'मि- थ- वन' का 'मिथुन' । यहां 'वन' (धा०) का 'व' 'उ' से बदल जाता है ॥ “अथ एनम्०” अब इसको इस (अगली ऋचा) से अग्नि करके स्तुति करता है (ऋषि)--॥ ७ (२६) ॥