निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (११४) ७ अ० ७ पा० ८ खं० (खं० ८) (निरु०) “यत्रा वदेते अवरः परश्च यज्ञन्योः कतरो नौ विवेद। आशेकुरित्सधमादं सखायो नक्षन्त यज्ञं क इदं विवोचत् ॥” [ ऋ० सं० ८, ४, १३, २, ] ॥ यत्र विवदेते दैव्यौ होतारौ—अयं च अग्निः, असौ च मध्यमः,—कतरो नौ यज्ञे भूयो वेद-इति । आशक्नुवन्ति सत्सहमादनं समानख्याना ऋत्विजः तेषां यज्ञं समश्नुनानानां, को न इदं विवक्ष्यति इति। तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥८ ३०)॥ अर्थ:-“यत्रा वदेते०” 'यत्र' जहां 'अवरः' (अयं च अग्निः) इधर वाला यह अग्नि 'परः च' (असौ च मध्यमः) और वोह मध्यम (दैव्यौ होतारौ) देवताओं के होता दोनों 'आ-वदेते' (विवदेते) विवाद करते हैं—'यज्ञन्यो' (यज्ञ- नेत्रोः) यज्ञ के नेताओं 'नौ' (आवयोः) हम दोनों में (यज्ञे) यज्ञ के विषय में 'कतरः' कौनसा 'विवेद' (भूयोवेद) अधिक जानता है। 'सखायः' (समानख्यानाः ऋत्विजः) समान ज्ञान वाले ऋत्विज् 'यज्ञम्' यज्ञ को 'नक्षन्त' (समश्नुवते) व्यापन कर रहे हैं-उस में बैठे हैं (ते) वे 'सधमादम्' (सत् सहमदनम्) हर्ष सहित 'आशेकुः' (प्राशक्नुवन्ति) कह सकते हैं-“को नः इदं विवक्ष्यति” हम में से कौन यह कह