निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 885, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्तं ( ११६ ) ७ अ० ७ पां० ६ खंड एतेन नामधेयेन भजेते भजेते ॥९(३१)॥ इति सप्तमाध्यायस्य सप्तमः पादः ॥७,७,। अर्थः- "यावन्मात्रम्०” । इस मन्त्र में न' कार 'सम्प्रति' ( अव्यय ) के अर्थ ( इस समय ) में है। क्योंकि- उपमान अर्थ का यहां असंभव है। (लोक में भी ) उपमान वाचक का सम्प्रति के अर्थ में प्रयोग होता है। जैसे- "इहेव निधेहि” 'अब यहां रक्खे' । [ मातरिश्वा ने किसी से पूछा कि- दिव्य होता अग्निका जो विज्ञान है, उसको क्या यह ब्राह्मण मनुष्य होता यज्ञ में आया हुआ धारण करता है? वह उसके प्रति कहता है । ] 'मातरिश्वः' ( हे मातरिश्वन् ) हे मातरिश्व देव ! 'सुपर्ण्यः' ( सुपतना. एताः रात्रयः ) सुन्दर पतन ( गमन ) करने वाली ये रात्रिएं 'उषसः' ( ज्योतिर्येष्ण्य ) उषा : प्रकाश के 'यावन्मात्रम्' जितने अंग 'प्रतीकम्' ( प्रत्यक्तं = प्रविष्टम् ) प्रविष्ट हुएको 'न' ( सम्प्रति ) इस समय या सच- मुच 'वसते' ( छादयन्ति ) ओढती है या धारण करती है, 'तावत्' उतना विज्ञान 'यज्ञम्' यज्ञ में 'आयन्' आया हुआ ब्राह्मण (अस्य) इस (अग्ने.) अग्नि 'होतु.' होता का 'अवर.' ( होता ) छोटा होता 'निषीदन्' ( होतृषदने ) होता के स्थान में बैठा हुआ 'उप-दधाति' धारण करता है- दिव्य अग्नि होता की अपेक्षा रात्रि में जितना प्रकाश का अंग होता है, वैसा ही बिलकुल थोड़ासा मनुष्य होता यज्ञ संबन्धि वि- ज्ञान को धारण करता है, अतः ऐसी अवस्था में जो कुछ यह करता है दिव्य होता अग्नि के अनुग्रह से ही करता है,