भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 886

हिन्दी निरुक्त ( ११७ ) ७ अ० ७पा० ६खं स्वयम् अपने बल से नहीं। इस प्रकार होतृकर्म के प्रति- पादन से यहां विशेष रूप से अग्नि की ही स्तुति है ॥ [ इस प्रकार यह सूक्त अग्नि के कर्म की प्रधानता के कारण वैश्वा- नर का है। जो इस सूक्त में "वैश्वानर" शब्द हैं, वे सब पार्थिव अग्नि के ही विशेषण हैं।] "होतृजपस्तु०" किन्तु होता का जप (मन्त्र) अग्नि से भिन्न वैश्वानर का है- 'देव सवितरेतं०' अर्थात्- हे 'देव' 'सवितः' सब के जानने वाले? 'एतं त्वा अग्निम्" इस तुझ अग्नि को 'वैश्वानरेण पित्रा सह" वैश्वानर पिता के साथ 'होत्राय' होम के अर्थ 'वृणते' [ यजन करने वाले ] ग्रहण करते हैं । "इममेव अग्निं सवितारम् आह" (इस मन्त्र में) इस (पार्थिव) अग्नि को ही (ऋषि) सविता (सब लोक का जनने वाला) कहता है। "मध्यमं वा उत्तमं वा पितरम्" मध्यम ज्योति को अथवा उत्तम ज्योति को (इस अग्नि का) पिता कहता है- बताया जाता है । "यस्तु सूक्तं०" किन्तु जो सूक्त को भजता है और जिसके लिये हविः का निर्वाप होता है, वह यही (पार्थिव) अग्नि वैश्वानर है। और दूसरे ज्योति (मध्यम उत्तम इस नाम (वैश्वानर) से निपात को ही भजते हैं- इस नाम को विशेषण रूप से भजते हैं ॥ ६ (३१) ॥ व्याख्या । स्मरण रहे कि- यह दैवत काण्ड है, इस सप्तम अध्या-