निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 90, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें६० अ० १ पा० ३ ख० १ २ । तृतीय पादकी विशेष व्याख्या । ( प्रथमः खण्डः ) नूनम्— { १ विचिकित्सा { —लोके——नूनं तव गृहे धनम् ? { —वेदे— { २ न नूनमस्ति नो श्वः कस्तद्वेद यदद्भुतम् अन्यस्य चित्तमभि-सञ्च रेण्य मुताधीतं विनश्यति [ ऋ० सं० २-४-१०-१ ] ( २-यः खण्डः ) पदपूरण————वेदे— { ३नून साते प्रतिवर जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी शिक्षा स्तोतृभ्यो मतिधग् भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः यह वह ज्योति है, जिसको मनुष्य बहुत कुछ कहते हैं क्योंकि—वह अन्धकारको दूर करके अपनेको प्रकट करती है। [उक्तिया] पूर्व दिशामे प्रज्ञानके समान ज्योति उठ रही है। निश्चय ही ये द्युलोककी दुहिताए (कन्यायि) रात्रिके व्यर्थरेको दूर करतो हुई, मनुष्योंके गमनको सफल करती हुई उषा आ रही हैं, जैसे कि यह पूर्व दिशा लाल होती आती है, और अन्धकार नष्ट होता जाता है। एक ही उषाके प्रशसाके लिये बहु वचन दिया है। १०—“तदु प्रयक्षतममस्य कम दस्मस्य चारुतममस्ति दसः । उप हरे यदुपरा अपिन्वन् मध्यर्णसो नद्य १ श्रतसृः ॥ [ऋ० सं० १, ५, ५, १] दूसरा उद्धरण— गौतम नौधस् ऋषिने इस त्रिष्टुप् छन्दमे इन्द्रकी स्तुतिकी है। प्रवर्ग्य मे विनियोग है। इस दानशील या दर्शनीय इन्द्रका और भी बहुत प्रकारका पूज्यतम कर्म है, जोकि— उसने एकान्त देशमे जहां मनुष्योंकी भीड नही है, बैठ कर चार मोटे जलवालो नदियोंको गिलाया और यज्ञ आदि कामको प्रवृत्त किया, अर्थात यहो इसका पूज्यतम कर्म है। १—विवेक पूर्वक निश्चयके अभिप्रायको विचिकित्सा कहते हैं ।