निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
६० अ० १ पा० ३ ख० १ २ । तृतीय पादकी विशेष व्याख्या । ( प्रथमः खण्डः ) नूनम्— { १ विचिकित्सा { —लोके——नूनं तव गृहे धनम् ? { —वेदे— { २ न नूनमस्ति नो श्वः कस्तद्वेद यदद्भुतम् अन्यस्य चित्तमभि-सञ्च रेण्य मुताधीतं विनश्यति [ ऋ० सं० २-४-१०-१ ] ( २-यः खण्डः ) पदपूरण————वेदे— { ३नून साते प्रतिवर जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी शिक्षा स्तोतृभ्यो मतिधग् भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः यह वह ज्योति है, जिसको मनुष्य बहुत कुछ कहते हैं क्योंकि—वह अन्धकारको दूर करके अपनेको प्रकट करती है। [उक्तिया] पूर्व दिशामे प्रज्ञानके समान ज्योति उठ रही है। निश्चय ही ये द्युलोककी दुहिताए (कन्यायि) रात्रिके व्यर्थरेको दूर करतो हुई, मनुष्योंके गमनको सफल करती हुई उषा आ रही हैं, जैसे कि यह पूर्व दिशा लाल होती आती है, और अन्धकार नष्ट होता जाता है। एक ही उषाके प्रशसाके लिये बहु वचन दिया है। १०—“तदु प्रयक्षतममस्य कम दस्मस्य चारुतममस्ति दसः । उप हरे यदुपरा अपिन्वन् मध्यर्णसो नद्य १ श्रतसृः ॥ [ऋ० सं० १, ५, ५, १] दूसरा उद्धरण— गौतम नौधस् ऋषिने इस त्रिष्टुप् छन्दमे इन्द्रकी स्तुतिकी है। प्रवर्ग्य मे विनियोग है। इस दानशील या दर्शनीय इन्द्रका और भी बहुत प्रकारका पूज्यतम कर्म है, जोकि— उसने एकान्त देशमे जहां मनुष्योंकी भीड नही है, बैठ कर चार मोटे जलवालो नदियोंको गिलाया और यज्ञ आदि कामको प्रवृत्त किया, अर्थात यहो इसका पूज्यतम कर्म है। १—विवेक पूर्वक निश्चयके अभिप्रायको विचिकित्सा कहते हैं ।
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हिन्दी निरुक्त। ६१ ┌ पदपूरण----------वेदे--- ४ प्रसोमादित्यो असृजत् │ [ ऋ०-सं०-२-७-६-४ ] │ [ व्याख्या - प्रासृजत सूर्यों रश्मीन् ] │ ( इति पदपूरण एव ) │ ┌प्रसीमेत्यादि० [ऋ० सं० सीम ┤ │ २-७-६-४] व्याख्या-प्रससृजत् │ │ सर्वत -( इति परिग्रहार्थ ) │ │ ५ विसीमतः सुरुचो वेन │ │ आवः ( वक्ष्यमाण ) └ परिग्रह----------वेदे---┤ [ यजु० सं० १३-३६ ] │ विसोमतःसु--वः [मा० │ स० छ० आ० ४-१-३-६] │ [व्याख्या आदिव्य सुरुच = रश्मीन्, │ सीमत = सन्त वि=आव = └ वातवान् । ३- - अगस्त्यने पहिले इन्द्रके लिये हविका निर्वाप करके पीछे मरुत देवताओका देनेका विचार कर लिया, इससे इन्द्रने आकर परिदेवना की, परिदेवना नाम क्रोधपूर्वक विलापका है। इसी निदानपर यह मन्त्र प्रकट हुआ है। | इन्द्र |--मेरा पहिले यह विचारणीय है कि - 'आजका हवि मेरा नही है, तो कलका भी न होगा। अर्थात आजके भागको छोड़कर कलके भागपर भी आशा नही कर सकते, क्योंकि—आज जो हमारे लिये हवि निर्वाप किया गया था, वही हमे नही मिला, तो कल पर क्या प्रत्याशा है ? कारण यह है कि -जो वस्तु उत्पन्न नहीं हुई है, उसको कौन जानता है, वह किसको होगी ? मेरी या दूसरेकी। और यह भी कारण है कि -दूसरेका चित्त चञ्चल होता है, उसकी स्थिरता नहीं। आजके हविको मैने जाना था कि—यह मेरा होगा, तो भी यह नष्ट हुआ जाता है। ३-गृत्समद ऋषि । पृष्ट्यके चतुर्थ अहन्में मरुत्त्वतीयम शस्त्र हैं। इस मन्त्रमें 'नूनम्' केवल पदपूरणके लिये ही है। हे इन्द्र ! तेरे पुत्रभावक कर्मम रहनेवाली जो दक्षिणा है, सो स्तुति करनेवाले यजमानको वर दे। [यद्यपि दक्षिणावान् कर्मसे ही फलकी प्राप्ति होती है, किन्तु दक्षिणासे नहीं, तथापि यहां दक्षिणाकी महिमा कहनेके लिये उसीमे फल सामर्थ्य कहा गया है ] दक्षिणामें हिरण्य धान्य आदि सब रहता है। और हे इन्द्र ! तू ऋत्विजोंको शिक्षा या सद्बुद्धि दे। और हम छोड़कर औरोंको
६२ अ० १ पा० ३ ख० २।
धन मत दे, अर्थात् पहिले हमें दे, और फिर औरोंको । और हमको धन मिल. जिससे कि हम् यज्ञमे या घरमें बडी बडी बाते कहे कि—“दो—खावे”। इसके अतिरिक्त हम वीरोंवाले होवे, अर्थात यदि अपुत्रवाले होवे, तो पुत्रवान् बने , और पुत्र- वान् होवे, तो कल्याण वीर पुत्रवाले हो । ४—ग्टत्सम-कूर्म्म या ग्टत्समदका पुत्र कूर्म ऋषि । त्रिष्टुप् छन्द सूर्य्य देवता। इस ऋचामि सूर्य्य की वरुण नामसे स्तुति की गई है । “प्रसीमादित्यो असृजद् विधर्त्ता ॠतं सिन्धवो वरुणस्य यन्ति । न श्राम्यन्ति न विमुञ्चन्त्येते वयो न पप्तू रघूया परिज्मन्” ॥ [ऋ० सं० २, ७, ६, ४] ‘सीम्’ निपात जब पदपूरण रहता है, तब इसका कुछ अर्थ नही लिया जाता। “आदित्य प्र असृजत” आदित्यने अपनी किरणोंको फैला दिया । [इस पक्षमे कहासे फैलाया ? या कहा फैलाया ? यह प्रश्न नही उठाया जाता] जब उक्त निपात परि- ग्रह अर्थमें होता है, [तो] “आदित्य सीम ( सर्वत ) प्र असृजत” आदित्य (सूर्य) ने सब जगहसे किरणोंको फैलाया’ [ऐसा अर्थ हो जाता है।] जो [सूर्य] ‘विधर्त्ता’ नाम रसोका या रश्मियोंका धारण करनेवाला है, अथवा अपनी रश्मियोंके जालके अन्तर्गत सब जगत्को धारण करनेवाला है। सूर्यके रश्मि वर्षाकालमे सरल या पूर्व दिशासे आभिमुख्यसे झरने लगते है, एव वैसेही सूर्यनारायणसे प्रेरित होकर सर्वलोकके जलको लेकर वरुण नाम सूर्यके मण्डलको चले जाते हैं इस प्रकार गति-दिवस- जलका लेना और छोडना इस अपने कर्मको करते हुए नहीं थकते हैं, तथा थक कर भी वैराग्यसे भी उस कर्मको नहीं छोडते। पक्षियोंके समान शीघ्र गतिसे सम्पूर्ण जगत्मे गमन करते हुए भी ये रश्मि न थकते ही है और न अपने कर्मको छोडते ही हैं। थकनेके भयसे इन्हे अपनी गति कभी धीमी नहीं करनी पडती । ऐसे गुणवाले रश्मियोका भी फैलाने या समेटनेमें सूर्य ही प्रभु है, इस लिये उस सूर्यकी ही स्तुति है । ५—वामदेवके पुत्र नकुल ऋषिने इस त्रिष्टुप् छन्दसे आदित्य देवताकी स्तुति की है। प्रवर्ग्य मे तथा अग्निचयनमें सुवर्णके धारणम विनियोग ह । 'ब्रह्म जज्ञानं प्रथम पुरस्ताद् विसीमतः सुरुचो वेन आवः । सबुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः ॥ [य० सं० १३, ३] आदित्याख्य ब्रह्मने जब जगत्में अन्य पदार्थ उत्पन्न नहीं हुये थे, पहिले पूर्व दिशामे का
हिन्दीनिरुक्त । ६३ ( ३ यः खण्डः ) १ सर्वनाम-अन्य अर्थमे | १ ऋचांस्त्वः पोषमास्ते प्रथमा एक.व० | पुपुष्वान् गायत्रन्त्वो गा- . | र्यात शक्करीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत्वः ॥ [ऋ०स० ८,५,२-२४] * त्व-सर्वनाम २ अङ्गनाम-द्वितीया- ⎧ २ उत त्व सख्ये स्थिरपीत- अनुदात्त एक वच० ⎨ माहु' इति ⎩ [ऋ०सं० ८,२-२३-४] ३ अन्यार्थ-चतुर्थी- । ३ उतौ त्वस्मै तन्वं विसस्रे एक व० । [ऋ० स० ८-२ २३-५] ( चतुर्थ खण्डः ) ४अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः । ४ ,, प्रथमा बहु च० आदघ्नास उपकक्षास उ त्वे हृदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ॥ [ ऋ० स० ८-२-३४-२ ] अच्छे प्रकाशवाली अपनी किरणोंको सर्व ओर फैलाया था, इस कर्मके उपलक्षणसे प्राची (पूर्व) दिशा अपना प्राचीत्त्व रखती है। उसी मेधावी आदित्यने सब दिशा- ओंको फैलाया या प्रकट किया है, जो दिशायें बुध नाम अन्तरिक्षकी अवयवभूत और सब जगत्को उपनिर्माण करनेवाली हैं अर्थात् इनमे ही सब जगत् प्रतिष्ठित होता है। तथा इन्हींमें सब जगत् भिन्न भिन्न होकर स्थित होता है, भाव यह है, कि—ऐसे गुणोंवाली दिशायें सूर्यके उदयसे ही प्रकट होती हैं। एवम् उसी आदित्य ब्रह्मने स्थूल सूक्ष्म जगत्के कारणको प्रकट किया है ॥ *- त्व शब्दकी कई आचार्योंने निपातोंमें गणना की है, किन्तु भाष्यकारके मतमें लौकिक वैदिक उदाहरणादि उपपत्तियोसे सर्वनामसंज्ञक नाम ही है सन्दिग्ध होनेसे ही निपातोंमे इसका अवतरण हुआ है। १—अत्र प्रथमादिपादेषु होतुद्गात्रुब्रह्माख्येषु प्रत्येक कर्मण ऋगध्ययन सामगानमितरैश्च
६४ अ० १ पा० ३ ख० ५ । ( पञ्चम-खण्डः ) त्वत्—समुच्चयार्थे—वेदे—पर्याया इव त्वदाश्विनम् [ऋ०प्रा०१२-१० [व्याख्या आश्विनञ्च पर्यायाश्च] ऋत्विगभ्य "इदमन्वब्रूवत इति विज्ञाानकथनम् इतिकर्त्तव्यताकरणञ्च इतीतेषा कर्मणा विनियोग उक्तः । इस ऋचामें होता, उद्गाता, ब्रह्मा और अध्वर्यु, चारो ऋत्विजोका कर्म निरूपण किय है। जैसे होता नाम ऋत्विज् कर्मकालमे ऐसी ऋचाओकों अध्ययन करता है, जिनमे देवताओके यथार्थ स्वरूप तथा कर्मके मर्मस्थानोकी क्रियाका वर्णन होता है, एवम् जिनके अध्ययनसे कर्मका पोषण होता है। उद्गाता ऋत्विज् शक्वरी नामवाली ऋचाओमे गायत्र छन्दका गान करतां है। अर्थात उद्गाताका सामगानरूप कर्म नियत है। ब्रह्मनाम एक ऋत्विज् कर्ममे कोई प्रायश्चित्त उपस्थित होनेपर अन्य ऋत्विजोको उसका विज्ञान कराता है, कि 'यज्ञा यह करो'। क्योकि ब्रह्मा तीनो वेदोका जानर्न वाला होनेसे सब विद्याओका वक्ता होता है। जो सब ज्ञज्ञ नहीं होता वह ऐसे अधिकारको नही निभा सकता। और अध्वयु नाम ऋत्विज् यज्ञअकी नानाप्रकारकी इतिकृत्त ग्यताको करता है। इसका व्याख्यान १ माध्यार्क ६ठ पाद ४ खण्डमें देखो। व्याख्यान अ०१ पा०६ ख०३ मे देखी। “उ॒तत्व॒: पश्य॒न्न द॑दर्श॒ वाच॒-मु॒तत्व॒: शृ॒ण्वन्नशृ॑णोत्येनाम् । उ॒तो त्व॑स्मै त॒न्वं १ विस॑स्रे जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासाः॑ ॥ [ऋ० स० ८, २, २३, ४] ५ बृहस्पति ऋषि। विद्यामक्त ऐसे मनुष्य जो सब नेत्रवाले है, इतना ही नहीं, बल्कि— उनको सभी इन्द्रियां समान हैं, तथा पीठ, पेट, हाथ और पांव भी समान है, एवम् सभी मनुष्य सखि नाम समान जानकारी- वाले हैं, अथवा समान शास्त्रोंमें श्रम किये हुये है, अर्थात् वैयाकरण वैयाकरणोंके ही समानख्यान है, नैरुक्त (निरुक्तके पढ़नेवाले) नैरुक्तोंके ही समानख्यान (ज्ञान) हैं, तो भी वे मनोगम्य (प्रतिभासे जानने
हिन्दी निरुक्त । ६५ [ (३) पदपूरण ] क्रियावाचकमाख्यातमुपसर्गोविशेषकृत् । सत्त्वाभिधायकं नाम निपातः पदपूरणः ॥ कम्, ईम, इत् और उ,और कहीं कहीं इव य निपात गद्यग्रन्थोमे वाक्यपूरण और पद्य-ग्रन्थोंमें पदपूरण होते है । ये प्रायः अनर्थक होते है, अर्थवान् कदाचित् ही कही होते होगे ॥ कम्—पदपूरण—वेदे—१ निष्षक्रासश्चिद्विन्नरो भूरितोका वृकादिव । बिभ्यस्यन्तो ववाशिरे शिशिरञ्चोवनाय कम् ॥ २—मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कम् [ऋ० स० ८, ८, १६, १] { व्याख्या - कम् इति पदपूरण एव, } { जीवनाय कम् जीवनाथमित्यर्थ } [ आ-इम-ण्ण | ] योग्य) अर्थोंमे समान नही होते, किन्तु कोई पुरुष ऊहा, अपोहन, धारण और वक्तृत्वमें समर्थ होते है और कोई मेधा रहित होते हैं वे सच्ची बातोतक पहुचते नही । ये किस प्रकार परस्पर असमान है, यह दृष्टान्तसे प्रतिपादन करता है ।—कोई विद्वान् बुद्धिसे उस ह्रद (तडाग) के समान हैं, जिसमे मनुष्यके मुखके बराबर जल भरा हुआ है, कोई काखके समान जलवाले ह्रदके समान है, और कोई विद्वान् अपरिमित जलवाले तडागोके समान है, अर्थात् उनके प्रज्ञानका कोई प्रमाण नही है, वे ऐसे दिखाई देते हैं ।
- आ-इम एनम् = एसनम् । आ ( आङ् उप० ) आमुखा अर्थ मे 'सन्नत' क्रियामें स युक्त हांगया, और 'णभ्' उसीका कर्मकारक है, तथा 'इम्' निरर्थक होकर पदपूरण मात्र करता है । , "शिशिरञ्चौवनाय कम्" इस उदाहरणका शेषभाग वृत्तिकारको सन्तोषदायक नही मिला इससे उन्होंने "गाथ्वान्तरंषु ग्रैषो दृष्ट्वा " ऐसा कर दिया है। जो कुछ
६६ अ० १ पा० ३ ख० ६ । ईम्--पदपूरण--वेदे--*एमेनं सृजता सुते .(ऋ०स० १,१,१७,२)
- व्याख्या:-आसृजतैनं सुते--आभिमुख्येन-'ईम्' इति पदपूरण एव । इत्--पदपूरण--वेदे--१ तमिद्वर्द्धन्तु नो गिरो वत्स सशिश्वरीरिव । य इन्द्रस्य हृद् सनिः [ऋ०सं०-७ १-२०-५] उ--पदपूरण--वेदे--२ अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम् । वचस्तच्चिन्न ओहसे ॥ [ऋ०स०१-२-२८-४] अयम् इति वर्त्तमान सन् अय मान य प्रात नित्यकालमेव त्वं सम्पतसि उ-इति पदपूरण ( षष्ठः खण्डः ) ( कदाचित् ) इव--वाक्यपूरण (१) सुविदुरिव व्या०( सृष्टु विदु यज्ञज्ञ ब्राह्मण, इति ) (२) सुविज्ञायते इव [इवोऽनर्थक एव वाक्य पूरण ] [व्याख्या —सृष्ट विज्ञायते यज्ञज्ञो नक्षत्र ब्राह्मणै ]
उनको पाठ मिला वह उन्होंने पूर्णरूपसे यह उद्धृत कर दिया है । किन्तु “केचित्” पदके द्वारा इसमें वे अपनो अरुचि प्रकट करते है। प० सत्यव्रत सामश्रमी महाशयने इसका ऋक्सं हितामे पता दिया है वहाँ दूसरे उदाहरणके अनुसार पता व पाठ है । “शिशिरं जीवनाय कम्” इस मन्त्रमें ‘कम्’ यह निपात पदपूरण है । शेष वाक्यका यह अर्थ है, कि-शिशिर ऋतु प्राणियोंके जीवनके लिये होता है क्योकि उसमें शरद्ऋतुके बोये हुये धान्य बहुत निपजते है । सम्पूर्ण मन्त्रका अर्थ--कोई वस्त्रहीन बहुतसन्तानवाले दरिद्र मनुष्य हेमन्तऋतुमे शीतसे भेड़ियेके समान डरते हुये बार बार चिल्लाते हैं, कि 'हमारे जीवनके लिये शिशिर ऋतु आता है,
हिन्दी निरुक्त । ६७ (४) निपात समाहार. नेत्—०—परिभये—वेदे—१ हविर्भिरेके स्वरितः सचन्ते (न+इत्) (सर्वतोभये) सुन्वन्त एके सवनेषु सोमान् । शचीर्मदन्त उत दक्षिणाभि र्ने ज्जिह्मा- यन्त्यो नरकम्पतामेति ॥ व्याख्या —नेत्—इति पदपूरण वय जिह्मायन्ता जिह्मम् आचरन्त्य भगवन्- } नरकं पताम नचेत्— अनुपृष्टेऽर्थे—लौके—नचेत् सुरां पिबन्ति (न+च+इत्) व्याख्या — { कोई किसीसे पूछता ह प्र० खड हैं शूद्र उ० खड़े हैं । अनु० प्र० खड हे तब क्यों नहीं आजाते पुन उ० नचेत् सुरा पिबन्त्यागमिष्यन्ति यदि सुरा नहीं पीते हैं तो आजायेंगे । क्योकि उसमे बहुत थोड़ा शीत होता है, उनमें हम सुखसे जीयेंगे” ॥ १ अमहीयु आङ्गिरस ऋषि । सोम देवता । गायत्री छन्द । ग्रावस्तुतिमं विनियोग है । हमारी गिरायें (वाणियें) उस सोमको, जो इन्द्रके हृदयमें लगता है, बढ़ावें, जैसे-एक बच्छेवाली बहुतसीं गौवें क्रम क्रमसे अपन अपन दुग्धोसे एक बच्छेका पोषण करती हैं। अर्थात् बहुत गौओंके और और बच्चे मर जानेपर कदाचित् उनका एक बच्छा ही जीता रहे और वे सब उसी वत्ससे अपना स्नेह कर लें । तथा उसे ही अपना अपना दुग्ध पिलाने लगें । १३
६८ अ० १ पा० ३ ख० ६ । (नोट) इस प्रकार अनेक (ऊंचे नीचे) अर्थोंमें निपात समाहार आते हैं। वे सब लक्षण शास्त्रके अनुसार (निरुक्तकी रीतिसे) कौन किस अर्थमें हैं सो देख लेने चाहियें। ( इति तृतीयः पादः समाप्तः ) २ यूपमें नियुक्त हुये शुनःशेपने अपने मोक्षकी इच्छासे इस गायत्री छन्दसे इन्द्रकी स्तुतिकी है। हे इन्द्र ! जिस प्रकार कपोत (कबूतर) कपोतिका (कब्तूरी) या अपने अण्डोंवाले घोंसलेके प्रति बार बार गिरता है उसी प्रकार जिस सोमके प्रति तू नित्यकाल ही गिरता है, वही यह सोम ऋत्विजोंसे तैयार किया हुआ है। इससे हमसे तुम्हारा यह क्या प्रयोजन होगा ? हमे छुड़ा दे। क्या हमारे बार बार रोते हुओंके स्तुतिरूप इस वचनके अभि- प्रायको तू नहीं जानता ? कि हम किस प्रयोजनसे यह कह रहे हैं। कौनसे तुम्हारे गुण इसमें नहीं आये, जिससे कि तू हमें इस यूपसे नहो छुड़ाता है। अर्थात् यह सुन कर बुद्धिसे अर्थको जानकर तथा हमारी आर्त्तता (पीड़ा) को निश्चय करके कारुण्य भावसे हमे छुड़ा दे। भाव यह है कि हमसे हो तुम्हारा क्या प्रयोजन है; जब कि हमसे भी बहुत उत्तम सोमरस तुम्हारे लिये अभिषुत तैयार है। १ ऐसा सुना गया है कि नारदजीने परीक्षार्थ असुरोंकी स्त्रियोंको उनके पतियोंमें अश्रद्धा उत्पन्न करनेके लिये कुछ धोखेकी बात कही थी, उसीका उत्तर उन्होंने नारद जीको इस मन्त्रसे दिया है। कोई पुरुष देवताओके लिये पुरोडाश आदि रूप हवि देकर इस लोकसे स्वर्गमें जाते हैं। कोई सोमयाग करके स्वर्गमें चले जाते हैं, कोई स्तुति करके, एवम् कोई बहुत दक्षिणाओंके दानसे स्वर्गको प्राप्त कर लेते हैं, इस रीतिसे भिन्न भिन्न उपायोंसे अपने अपने
अथ द्वितीय-तृतीय-पादयोः ————— प्रासङ्गिकाः शब्दाः। (द्वितीयः पादः) २-यः खण्डः। (चित्) (१) आचार्य्यः = (१) आचारं ग्राहयति (२) आचिनोत्यर्थान् (३) आचिनोति बुद्धिम्। (२) कुल्माषाः = कुलेषु सीदन्ति ” ३-यः खण्डः। (नु) (१) वयाः = शाखाः वेतेः-वातायना भवन्ति (२) शाखाः = खशयाः शक्नोतेर्वा (चादि) कर्मोपसङ्ग्रहः = यस्यागमात् अर्थ पृथक्त्वमह विज्ञा- यते नत्वौद्देशिकमिव विग्रहेण पृथक्त्वात् स कर्मोपसङ्ग्रहः ॥ ———— ( ३-यः पादः ) १-मः खण्डः। (क) (नूनम्) (१) न नूनमस्ति- विनश्यति = अगस्त्य इन्द्राय ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ कल्याणके प्रति सब प्राणियोंके उद्यत होने पर, हमें भी जप होम आदिका अधिकार न रहनेसे अपने कल्याणके अर्थ पतियोंकी सेवा करना चाहिये, जो कि स्त्रियोंके लिये एकमात्र उपाय है। यदि हम उसे भी न करें, या उनसे भो छल करें तो हमें नरक ही मिलेगा। भाव यह है कि स्त्रियोंके लिये पतिसेवासे अन्य और कोई धर्म नहीं है॥
१०० अ० १ पा० ३ ख० २ । हविर्निरूप्य मरुद्भ्यः [विचिकित्सा] सम्प्रदित्सांचकार सइन्द्र एत्य परिदेवयांचक्रे । (२) परिदेवना = मन्युपूर्वको विलापः । (३) द्युः = इति अह्नो नामधेयं द्योतते इति सतः, (द्योतते इति कर्तृकारकम् ) सतः-सदिति यत्र ब्रूयात् तत्रो- च्चारित एव कारकनियमो द्रष्टव्यः अन्यत्र यथेष्टं योज्यम् । (४) श्वः = उपशंसनीयः कालः । (५) ह्यः = ह्नो हीनः कालः । (६) अद्भुतम् = अभूतम्, अभूतमिवान्यस्य, शोणितवर्षादि, अभूतमिव कादाचित्कत्वात् । (७) अभिसञ्चरेण्यम् = अभिसञ्चारि । (८) अन्यः = (१) नानेयः—नानात्वेन व्यवस्थितस्य असत्कुलजस्यापत्यम्, ( २ ) अथवा न सतामानेयः । (९) चितम् = चेततेः । (१०) आधीतम् = आध्यातम् अभिप्रेतम् । २-यः खण्डः । (ख) (नूनम्)॰ (१) वरः = वरयितव्यो भवति । [ पदपूरणे ] (२) जरिता = गरिता इति स्तुत्यर्थस्य । (३) मघोनी = मघवती (धनवती) । (४) मघम् = धनम् ( मंहतेर्दानकर्मणः )
हिन्दी निरुक्त । १०१ (५) दक्षिणा = दक्षतेः समर्द्धयत्यर्थस्य- अथवा-दक्षिणा दिक्-हस्तप्रकृतिः-प्राङ्मुखस्य प्रजा- पतेर्दक्षिणो हस्तो बभूव सा दक्षिण दिगभवत् । (६) दक्षिणोहस्तः = दक्षतेः उत्साहार्थस्य सहि उत्साहवान् भवति कर्मसु न तथा सव्यः । दाशतेर्वा स्यात् दानार्थस्य ( तेनैव प्रायेण दीयते ) , (७) हस्तः = हन्ते तेन हि हन्यते न अन्येनापि केनचिदङ्गेन । (८) प्राशुः = शीघ्रः (६) बृहत्-महतो नामधेयम्-परिवृढम्भवति । (१०) वीरः = (१) वीरयत्यमित्रान् नानाप्रकारम्मारय- तीत्यर्थः, (२) वेतेर्वास्थात्-गतिकर्मणः ( गत्यर्थे वर्त्तमानस्य ) गच्छत्येवासावभिमुखं शत्रून्, (३) वीरयतेर्वा-( विक्रमार्थस्य ) विक्रान्तो ह्यसौ भवति । (सीम्) (१) सुरुचः = आदित्यरश्मयः-सुरोचनादपि वा । (२) सीम = सीम्नः सीमतः सीमातः मर्यादातः सीमा (सीमा) मर्यादा विसीब्यति देशौ विगतसन्तानौ देशौ करोतीत्यर्थः । ( ३यः खण्डः ) (त्व) (१) त्वः = एक-अन्यः ।
१०२ अ० १ पा० ३ ख० ४ । ( २ ) ऋक् = अर्चनी । ( ३ ) गायत्री = गायत्रं-गायतेः-स्तुतिकर्मणः । ( ४ ) शक्वर्यः = ऋचः शक्नोतेः-तद् यदाभिर्वृत्रमशकद्धन्तुं तच्छक्करीणां शकरोत्वमिति विज्ञायते । ( ५ ) जातविद्याम् = जाते जाते विद्याम् । ( ६ ) ब्रह्मा = ( १ ) सर्वविद्यः, ( २ ) सर्वं वेदितुमर्हति, • ( ३ ) परिवृढः ( परिवृलढः ) श्रुततः । ( ७ ) ब्रह्म = परिवृढ सर्वतः । ( वेदःपरब्रह्म च ) ( ८ ) अध्वर्युः = ( १ ) अध्वरयुः ( यु प्रत्यय ) ( २ ) अध्वरं युनक्ति, ( ३ ) अध्वरस्य नेता ( प्रापयिता ) ( ४ ) अध्वरं कामयते कर्त्तुम् । ( ५ ) अध्वरमधीते यः स अध्वर्युः । ( ९ ) अध्वरः = यज्ञः । ( १० ) ध्वरः = ध्वरति हिनस्तीति ध्वरः । ध्वरति, धूर्वति इति हिंसार्थेषु पठितौ, तत्प्रतिषेधः अध्वरः अहिंस्र इत्यर्थः । ( ४र्थः खण्डः ) ( ११ ) अक्षण्वन्तः = अक्षिमन्तः । ( १२ ) अक्षि = ( १ ) चष्टेः ( चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि ) ( २ ) अनक्तेः इति आग्रायणः, “तस्माद् एते व्यक्ततरे इव भवत इतिह विज्ञायते ।”
हिन्दीनिरुक्त । १०३ ( १३ ) कर्णाः = ( १ ) कृन्ततेः निकृत्तद्वारो भवति, । ( २ ) ऋच्छतेः इत्याश्रापणः "ऋच्छन्तीव खे, उदगन्तामितिह विज्ञायते ।” ( १४ ) मनोजवेषु = मनसां प्रजवेषु । ( १५ ) आदघ्नासः = आस्यदघ्नाः । ( १६ ) त्वे = अपरे ( १७ ) उपकक्षासः = उपकक्षदघ्ना उपकक्षपरिमाणा इत्यर्थः । ( १८ ) आस्यम् = ( १ ) अस्यतेः—असुक्षेपणे क्षिप्यते हि एतदाभिमुख्येन अन्नम् । ( २ ) स्यन्दतेर्वा--आसन्दते एतदन्नम्, शुष्केऽपि ह्येतदन्ने आगते स्रवत्येव श्ले- ष्माणं येन तदार्द्रीकृतं ग्रसितुं शक्यते । ( १६ ) दघ्नम् = ( १ ) दघ्यतेः स्रवतिकर्मणः स्रुततरमिव भवति उत्तरात् परिमाणात् । ( २ ) दस्यतेर्वा स्यात् क्षयार्थस्य विदस्ततरं हि उपक्षीयमाणं तद्भवति उत्तर- स्मात्परिमाणात् । ( २० ) प्रस्नेयाः = प्रकर्षेण स्नातुं येषु योग्य अगाधत्वात्–ते प्रस्नेयाः स्नानार्हाः इत्यर्थः । ( २१ ) ह्रदः = ( १ ) ह्लादतेः शब्दार्थस्य, ( २ ) ह्लादतेर्वा स्यात् शीतीभावकर्मणः (ग्री- ष्मेऽपि हि असौ शीतल एव भवति ) +शुष्केऽपि अन्ने आगते सति एतत् मुख श्लेष्माणं स्रवतीत्यादिरर्थः ।
१०४ अ० १ पा० ३ ख० ६ ( ५मः खण्डः ) (कम्) ( १ ) *शिशिरम् = ( १ ) शृणातेः—हिंसार्थस्य हिनस्ति तस्मिन् काले अप्रतिबध्यमानः अतिशयेन दावाग्निः शुष्कान् ओषधिवनस्पतीन् । ( २ ) शम्नातेर्वा—हिंसार्थस्यैव नाथा- कृतो विशेषः । ( इत् ) ( १ ) गिरः = स्तुतयः—गृणातेः । ( ६ष्ठः खण्डः ) ( नेत् ) ( १ ) नरकम् = ( १ ) न्यरकम्, ( २ ) नीचैर्गमनम्, ( ३ ) नास्मिन् रमणं स्थानमल्पमप्य- स्तीति वा ।
- (न चेत्) ( १ ) सुरा = सुनोतेः सा हि अभिषूयते अनेकैर्द्रव्यैः पिष्टादिभिः । चतुर्थ पादः । ( खं० १ ) इति इमानि चत्वारि पदजातानि अनुक्रान्तानि, —नामाख्याते चापसर्गनिपाताश्च । तत्र ‘नामानि आख्यातजानि-’ इति शाकटायनः, नैरुक्तसमयश्च । ‘न सर्वाणि'-इति गार्ग्यः, वैयाकरणानाञ्चैके । तद् † त्यच्छब्दस्यैव एतौ रूपौ, खे अभिव्यक्ता सन्, शब्दाः । एतावपि च उदगन्ता दृच्छत इव गृह्णाय । विचार्यमाणे ज्ञायते खे रूपौविति ।
हिन्दी निरुक्त। १०५
यत्र स्वरसंस्कारौ समर्थौ प्रादेशिकेन गुणेन अन्वितौ स्यातां संविज्ज्ञातानि तानि । यथा-गौः, अश्वः, पुरुषः, हस्ती, इति । अथ चेत् सर्वाणि आख्यात- जानि नामानि स्युः,―'यः कश्च तत्कर्म कुर्यात्, सर्वं तत्सत्त्वं तथा आचक्षीरन् ?' 'यः कश्च अध्वान- मश्नुवीत अश्वः स वचनीयः स्यात् ?' 'यत्किञ्चित् तृन्द्यात् तृणं तत्' ? अथापि चेत् सर्वाणि आख्यात- जानि नामानि स्युः,---'यावद्भिर्भावैः संप्रयुज्येत ताव- द्भ्यो नामधेय-प्रतिलम्भः स्यात् ॥ १ ॥
( खं० २ )
अथापि य एषां न्यायवान् कार्मनामिकः संस्कारो यथा चापि प्रतीतार्थानि स्युः, तथा एनानि आचक्षी- रन्,―पुरुषं 'पुरिशय' इति आचक्षीरन् ? 'अष्टा' इति अश्वम् ? 'तर्दनम्' इति तृणम् ? । अथापि निष्पन्ने अभिव्याहारे अभिविचारयन्ति―प्रथनात् पृथिवी-इति इत्याहुः―'क एनामप्रथयिष्यत् ? किमा- धारश्च ? अथ अनन्वितेऽर्थे, अप्रादेशिके. विकारे पदेभ्यः पदेतरार्द्धान् सञ्चस्कार शाकटायनः,―एतेः कारितं च यकारादिञ्च अन्तःकरणम्, अस्तेः शुद्धञ्च सकारादिञ्च ? । अथापि 'सत्त्वपूर्वोभावः'―इत्याहुः, १४
१०६ अ० १ पा० ४ ख० २। 'अपरस्माद् भावात् पूर्वस्य प्रदेशो नोपपद्यते ?'—इति नोपपद्यते ॥ २ ॥ (चतुर्थः पादः) अबसे पहिले आख्यात, नाम, उपसर्ग और निपात ये चारों पद क्रमसे व्याख्यापूर्वक वर्णन किये गये हैं, [किन्तु पूर्व प्रतिज्ञाके अनुसार नामका कुछ अंश अब निरूपण किया जाता है ] शाकटायन और गार्ग्यवर्जित सब नैरूक्तोंका सिद्धान्त है कि—"सभी नाम सामान्य रूपसे आख्यातसे उत्पन्न हुए है ।" गार्ग्य और कोई कोई वैयाकरण पूर्वमतके विपक्षमें ऐसा मानते हैं कि—"सब नाम आख्यातसे उत्पन्न नहीं है।" गार्ग्यके मतका स्पष्टीकरण । गार्ग्यके मतमें नामोंके (३) तीन विभाग हैं,—प्रत्यक्षक्रिय, प्रकल्प्यक्रिय और अविद्यमानक्रिय । कारकः, हारकः इत्यादि प्रत्यक्षक्रिय, गौः, अश्वः इत्यादि प्रकल्प्य क्रिय तथा डित्थः, डवित्थः, अरविन्दः, अर्वाङ्, चन्द्रः इत्यादि नाम अविद्यमानक्रिय हैं। अर्थात् जिन नामोंमें उदात्त आदि स्वर एवं प्रकृति, प्रत्यय आदि रूप संस्कार दोनों लक्षण शास्त्रमें विहित उपपत्तिसे युक्त हो तथा उन धातुओंमे, जिनकी वाच्यक्रियाओंसे वे नाम प्रतिष्ठित माने गये हों, अनुगत हों, वे नाम आख्यातज हैं। इन्हींको कोई आचार्य्य संविज्ञात या संविज्ञान पद कहते हैं। जिन गौः, अश्वः इत्यादि नामोंमें क्रियाकी साक्षात् प्रतीति नहीं होती है किन्तु कल्पना की जा सकती है वे प्रकल्प्यक्रिय नाम होते हैं। एवम् जिन डित्थः, डवित्थः इत्यादि नामोंमें क्रियाकी कल्पना भी नहीं हो सकती, वे अविद्यमानक्रिय या रूढ़ि शब्द कहाते हैं।
हिन्दी निरुक्त । ,१० इन्हीं शब्दोंको कोई आचार्य संविज्ञातपद कहते हैं। गार्ग्य आचार्य्य कहते हैं कि-जब डित्थ, डवित्थ आदि शब्दोंमें धातु- ओंकी कल्पना भी नहीं की जासकती तो सब शब्दोंको आख्यात- से उत्पन्न मानना भूल ही है, अर्थात् शाकटायनके मतमें यह पहिला अव्याप्तिरूप दोष है। २रा दोष यह है कि-यदि सब शब्दोंको उत्पत्ति आख्यातसे मानेंगे तो जो कोई सत्त्व या प्राणी उस कर्म अथवा क्रियाको करेगा, सभी उस तरह बोला जायगा। जैसे-जो कोई भी मार्गको अशन या व्यापन करेगा वही 'अश्व' कहलाएगा, तथा जो कोई भी तर्दन करेगा, वही तृण कहा जायगा। अर्थात् एक कर्मके करनेवाले सभी प्राणी एक नामसे बोले जाने चाहिएं, किन्तु अश्व उस क्रियाको नहीं करनेकी अवस्थामें भी अश्व कहा जाता है, और अन्य प्राणी उस क्रियाको करनेसे भी अश्व नहीं कहे जाते। जब कि-इसमें कोई विशेष हेतु नहीं है, तो मानना होगा कि-अशन क्रियाके अभिप्रायसे अश्व को अश्व नहीं कहा ' जाता, अपि तु क्रियाकी अपेक्षा न रखकर अर्थके बोधनके लिये यह शब्द व्यवहार मात्र है, इससे सब नाम आख्यातसे उत्पन्न नहीं हैं। ३य दोष-जिस द्रव्यमें जितनी क्रियाओंका सम्बन्ध होगा, उतने ही उसके नाम होंगे। क्योंकि-वर्त्तमान क्रियाओंमेंसे कुछ क्रिया- ओंके त्याग करने एवम् कुछ क्रियाओंके स्वीकार करनेका कोई विशेष कारण नहीं है। जैसे कि-स्थूणा (खम्भी) एक ही, दरमें शयन करनेसे 'दरशया' तथा उसमें बांस सञ्जन किया (पोया- जोड़ा) जाता है, इससे 'सञ्जनी' भी कही जावेगी, किन्तु वह इन नामोंसे बोली नहीं जाती है। अर्थात् शाकटायनके सिद्धान्तानुसार अनेक वस्तु एक क्रियाके सम्बन्धसे एक नामवाले होंगे, और एक
१०८ अ० १ पा० ४ ख० २ । वस्तुके अनेक क्रियाओंके सम्बन्धसे अनेक नाम होंगे । इससे सब नाम आख्यातसे उत्पन्न नहीं हैं। ४र्थ दोष-जबकि-सभी नाम आख्यात या धातुओंसे उत्पन्न हैं, तो क्यों नहीं सभी द्रव्य [ वस्तु ] ऐसे नामोंसे बोले जांय, जिनमें व्याकरण शास्त्रके न्यायसे संस्कार सिद्ध हो, तथा जिनसे उन वस्तुओंकी क्रिया स्पष्टरूपसे प्रतीत हो । अर्थात् जैसे-पाचक, लावक आदि शब्द व्याकरणसिद्ध तथा प्रतीतक्रिय हैं, वैसेही पुरुषको 'पुरिशय' कहेंगे, क्योंकि वह पुरीमें शयन करता है और वह ऐसा करनेसे प्रतीतक्रिय होताहै, ऐसेही अश्वको 'अष्टा' कहेंगे, क्योंकि वह अशन करता है, तथा तृणको 'तर्दन' कहेंगे, क्योंकि विना ही कारणके पुरुष आदि वस्तुओंको जिन नामोंसे उनकी क्रिया प्रतीत न हो उनसे [ पुरुष, अश्व आदिकोंसे ] बोलना न्यायसङ्गत नहीं है। ५ म दोष-शाकटायनादि आचार्य शब्दका प्रयोग करके, उसको सामने करके विचारते हैं कि-“यह किस धातुसे बना है।” जैसेकि प्रथन [ फैलाने ] क्रियाके सम्बन्धसे 'पृथिवी' नाम है। किन्तु हम पूछते हैं, कि-यदि इसका क्रियाके सम्बन्धके विनाही स्वाभाविक 'पृथिवी' नाम है, तो नहीं फैलनेवालीको किसने फैलाया ? यदि मानें कि-“ऐसी अवस्थामें भी किसीने इसका प्रथन किया ही है” तो प्रश्न उठता है-“प्रथन करनेवालेने किस आधार पर बैठकर प्रथन किया” क्योंकि-पृथिवी ही सर्व प्राणियों का आधार है और अनाधार पुरुषसे इस पृथ्वीका प्रथन शक्य नहीं। इससे प्रथन क्रियाका अभाव ही सिद्ध हुआ और प्रथनके अभावमें “सब नाम क्रियासे उत्पन्न हैं” यह सिद्धान्त भी अयुक्त ही हुआ। इससे “सब नाम आख्यातसे उत्पन्न नहीं हैं”। • ६ष्ठ दोष-वेदके जितने अङ्ग हैं, उनमें प्रत्येकके अनेक भेद हैं। इस रीतिके अनुसार निरुक्त १४ प्रकार और व्याकरण ८। प्रकार-
का है। ये दोनों ही वेदाङ्ग, शब्दके अनुशासनसे मुख्य प्रयोजन रखते हैं, इसीसे कुछ कुछ शब्दोंमें नैरुक्तोंका वैयाकरणोंके साथ ऐकमत्य तथा कहीं कहीं वैमत्य होना स्वाभाविक है। क्योंकि अपने अपने व्याकरणोंमें शब्दोंक अनुविधान या अनुशासनका क्रम भिन्न भिन्न रखते हैं। जैसे-पाणिनोय्य लोग 'भू' प्रकृति [ धातु ] लेकर उससे लट् प्रत्यय लगा कर तथा उसके 'अ' 'ट्' को खोकर शुद्ध 'ल्' के स्थानमें 'तिप्' आदि आदेश करते हैं, ऐसो ही रीतिसे वे अपने शास्त्रमें 'भवति' पदको साधन कर सकते हैं। एवम् अन्य वैयाकरण लट्के विना किये ही 'भू' से 'तिप्' आदिका योग करके 'भवति' पदको सिद्ध कर लेते हैं। उनके मतमें "लट्को पढ़ना और फिर उसका लोप करना"—और इन दूसरोंके मतमे "लट्के बिनाही तिप् आदि प्रत्ययोको ले लेना"—ऐसी ऐसी व्यवस्थाओंका उनके शास्त्रोंमें शास्त्र-शैलीके अतिरिक्त अन्य कोई प्रयोजन नहीं है। क्योंकि-सबका लक्ष्य 'भवति' पदका साधन ही है। गार्ग्य मुनि कहते हैं कि--शब्दोंके अनुशासनमें आचार्योंके- विविध उपायोंकी दल दलको देखकर शाकटायन आचार्यने सब नामोंके आख्यातज होनेकी प्रतिज्ञाको पालन करनेके लिये बेजोड काम भी करडाला है अर्थात् कहीं एक नामको अनेक धातुओसे बनाते हैं और कहीं एक नामको एक ही धातुसे जो कि अन्य व्याकरणोंमें अप्रसिद्ध है, किन्तु ऐसा करने पर भी शब्द अपने अर्थके पीछे नहीं चलता। इसीसे वह इस कृत्यके लिये पाणिन्यादि आचार्योंके आक्षेपभाजन बनते हैं। इसके अतिरिक्त शाकटायन अपनी प्रतिज्ञाको बहती हुई देखकर किसी किसी शब्दमें जब देखते कि -- जिस क्रियासे द्रव्य परिचित होता है, उस क्रियाके वाचक धातुका व्याख्येय शब्दमें प्रवेश नहीं होता ; तब नदीमें बहते हुए के तृणावलम्बनके समान पूरे पूरे आख्यात पदोंसे उनके अर्द्ध अर्द्ध