निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (१३६) ८ अ० १ पा० ३ खं० ' इस प्रकार यहां यही अग्नि 'द्रविणोदा' है, यह पक्ष स्थित है। सो यह पर पक्ष = क्रौष्टुकि- पक्ष के हेतुओं को बिना हटाए नहीं टिका हुआ जैसा ही है, इस कारण उनके निराक- रण = हटाने के अर्थ “यथो एतत्” इत्यादि रूप से कहा जाता है। “यथो एतत्” जो कि- फिर यह कहा गया है, 'वह बल और धन का बड़ा दाता है,' यह इन्द्र के 'द्रविणोदस्' होने में : कारण नहीं है। क्यों कि- सभी देवताओं में ऐश्वर्य है। [इससे सभी देवता बल और धन के देनेवाले हैं। अतः यह हेतु इन्द्र के 'द्रविणोदस्' होने में विशेष कारण नहीं होसकता।] “यथोएतत्” और भी जो यह कहा है कि- “ओजसो जातमुत मन्यएनम्” अर्थात्- मैं इसे ओजसे = बल से उत्पन्न हुआ मानता हूं। यह निगम भी इन्द्र के 'द्रविणोदस्' होने में विशेष कारण नहीं है। क्यों कि- यह अग्नि भी ओज से = बल से मथा जाता हुआ उत्पन्न होता है, इस कारण से ऋषि इसको (अग्नि को) सहस् का पुत्र = सहस् का सूनु = सह का यहु कहता है ॥ (क) “सहस्पुत्रो अद्भुत:” (ऋ० सं० २, ५, २८, ६) । अग्नि सहस् का पुत्र अद्भुत है। (ख) “सहसः सूनवाहुतः” । (ऋ० सं० ६,५,२४,३)। हे सहस् के सूनु ! बुलाया हुआ है। (ग) “अग्ने वाजस्य गोमतःईशानः सहसो यहो”