निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(ऋ० सं० १, ५, २७, ४) । हे अग्नि देव ! हे सहस् (बल) के यहु (पुत्र) ! 'गोमनः' 'वाजस्य' 'ईशानः' गो आदि पशुओं से युक्त अन्न का स्वामी है । "यथो एतत्" और जो फिर यह कहा गया है, कि- "अग्निं द्राविणोदसमाह" ऋषि अग्नि को द्रविणोदस् का पुत्र कहता है । [इसका यह अभिप्राय नहीं कि- द्रविणो दस् = इन्द्र से यह अग्नि उत्पन्न होता है किन्तु-) यहां ऋत्विज् 'द्रविणोदस्' = अग्नि के हविर्दाता कहे जाते हैं- ऋत्विज् अग्नि के द्रविणोदस् हैं- ऋत्विज् हवियों के दाता हैं, और वे ऋत्विज् इस अग्नि को उत्पन्न करते हैं, यह ऋषि के द्वारा कहा जाता है । "ऋषीणां पुत्रो अधिराज एषः" यह अग्नि देव अधिक चमकने वाला ऋषियों का पुत्र है । यह भी निगम है । "यथो एतत्" और जो फिर यह कहा है कि- 'उन ऋतुयाजों के पात्र का नाम 'इन्द्रपान' है, यह भी इन्द्र के द्रविणोदस् होने में कारण नहीं । क्योंकि-यह भक्तिमात्र है- गुण के वश 'इन्द्रपान' यह पात्र का नाम है । जैसे-सोम के पात्र भिन्न २ देवताओं के होते हैं, तो भी उन सब का 'वा- यव्य' नाम है, किन्तु वे इस कारण वायु देवता के ही नहीं होजाते, यह किसी गुण के कारण उनका नाम है = समाख्या है । इस कारण 'द्रविणोदस्' नाम-युक्त मन्त्र में 'इन्द्रपान' यह पात्र का नाम होने से इन्द्र द्रविणोदस् नहीं हो सकता । "यथो एतत्" और भी फिर यह कहा गया है, कि-इस इन्द्र को सोम पान से स्तुति करता है, इससे द्रविणोदस् इन्द्र