निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १३८ ) ८ अ० १ पा० ३ खं यह भी कारण नही हो सकता । क्योंकि-इस अग्नि में भी यह उपपन्न होता है—घटता है । “सोमं पिब मन्दसानो गणश्रिभिः” अर्थात्- हे भगवन् ! अग्निदेव ! इकट्ठे इकट्ठे तुम्हें आश्रयण करने वाले मरुतों के साथ ( त्वम् ) तू मोद करता हुआ सोम को पी । यह भी निगम है । इस प्रकार इस मन्त्र में सोमपान से इस अग्नि की भी स्तुति है, इस कारण सोमपान इन्द्र का ही लिङ्ग नहीं है । “यथो एतत्” और भी यह कहा है कि- “द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः” जिस द्रविणोदस् का पुत्र अग्नि है वह द्रविणोदस् सोम को पान करे । यह भी इन्द्रके द्रविणोदस् होने में कारण नहीं । क्योंकि-इस अग्नि का ही यह निगम है । ऋतुयाजों में अग्नि भी सोम का भागी है । क्योंकि- उन में “वनस्पते० ०द्रविणोदः” पिब ऋतुभिः” ( ऋ०सं०२,८,१,३ ) हे ‘वनस्पते!’ अग्नि देव ! हे ‘द्रविणोदः !’ ( त्वम् ) तू ‘ऋतुभि’ ऋतुओं के साथ सोम को पान कर । यहां ‘वनस्पते’ संबोधन पद के साथ समानाधिकरण ‘द्रविणोदस्’ विशेषण सम्बोधन है, इस कारण वनस्पति के अतिरिक्त और कोई द्रविणोदा नहीं हो सकता, और वनस्पति फिर निःसन्देह अग्नि है, “वह देवत्रा दिधिषो हवींषि” हे ‘ दिधिषो !, धारण करने वाले ( त्वम् ) तू ‘देवत्रा’ देवताओं के लिये ‘हवींषि’ हविष्यों को ‘वह’ लेजा । इस मन्त्र में हविः के लेजाने के संयोग से और