निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १४० ) ८ अ० १पा० ४खं 'वनस्पते ' हे भगवन् ! वनस्पति देव ! हे 'द्रविणोदः!' 'ते' तेरे 'वह्नयः' ( वोढारः ) वाहन = घोड़े 'मेद्यन्तु' ( स्नि- ह्यन्तु ) स्नेह करें, 'येभिः' ( यैः ) जिनसे ( त्वम् ) तू 'ईयसे' ( यासि ) गमन करता है । 'अरिष्यन्' किसी से भी न मारा जाता हुआं । 'वीलयस्व' अपने आपे को दृढ करले, [ -सोम पान के अर्थ ] । 'धृष्णो' हे शत्रुओं को धमकाने वाले ! 'आयूय' अंगुली से मिला कर 'अभिगूर्ये' उठा कर 'नेष्ट्रात्' ( नेष्ट्रीयात् धिष्ण्यांत ) नेष्टा के आसन से या नेष्टा के 'वषट्' मन्त्रके उच्चारण से दिये हुए सोम से 'त्वम्' तू 'ऋतुभिः' काल देवताओं के साथ 'सोमम्' अपने अंश (भाग) सोम को 'पिब' पान कर ! [ यह हम कहते हैं । ] 'धिष्ण्य' क्या ? धिषण्य । धिषण्य ही क्या ? धिषणा वाक् ( वाणी ) होती है, उसके अर्थ यह रखा जाता है, उस के पीछे बैठा हुआं होता शस्त्र = बिना गाए हुए मन्त्रों से स्तुति करता है । 'धिषणा' क्या ? वाक् वाणी । कैसे ? धारणार्थक 'धिष्' धातु से है । क्योंकि- वह अर्थ को धारण करती है । अथवा यह 'धीसादिनी' होने से धिषणा है । 'धीसादिनी' 'धी' बुद्धि अथवा कर्म उस पे बैठने वाली । अथवा 'धीसानिनी' होने से यह धिषणा है । क्योंकि- वह बुद्धि को सानती है- भजती है । “वनस्पते !” यह सम्बोधन पद इस 'द्रविणोदम्' को कहता है, इससे 'द्रविणोदस्' अग्नि है । अग्नि 'वनस्पति' कैसे है ? “एषहि०” क्योंकि- यह वनों का पाता है, अथवा पालक