निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 928, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६१ ) ८ अ० २ पा० ७ खं ‘जनयः-न’ (जायाः-इव) जैसे स्त्रिएं ‘पतिभ्यः’ पत्तियों के लिये शुम्भमानाः’ (शुशोभिषमाणाः) अपनी शोभा बढाने की इच्छा करती हुईं (मैथुनधर्मे) मैथुन कर्म में (ऊरू। जांघों को फैला देती हैं । ‘द्वारः!’ ‘देवीः!’ (देव्य) हे द्वार देविओ? (यूयम्) तुम ‘देवेभ्यः’ देवताओं के लिये ‘बृहतीः’ (बृहत्यः) बड़ी बड़ी ‘विश्वमिन्वाः’ सब संसार के आने जाने योग्य ‘सुप्रायणाः’ (सुप्रगमना) भले प्रकार आने जाने योग्य ‘भवत’ होजाओ । ‘ऊरू’ क्या ? ‘वरतरम् अङ्गम्’ बहुत उत्तम अङ्ग । ‘विश्वमिन्वा’ क्या ! ‘विश्वम् आभिः एति यञ्जे’ यज्ञ में इनके द्वारा सब संसार आता है ॥ व्याख्या । इस मन्त्र के द्वारा यजमान अपने यज्ञ के द्वारों को ऐसे खुले हुए चाहता है, जिनके द्वारा संसार के सब याचक आ कर उससे अपनी सब प्रार्थनाओं को पूरी करें । यज्ञ के अधिकारी की उदारता का स्वरूप इस मन्त्र से भले प्रकार जाना जासकता है । यहां ‘द्वार’ क्या देवता है ! यह द्वार (घरके दरवाजे) हैं- यह कात्थक्य आचार्य मानते हैं । अग्नि है- यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं । ‘उषासानक्ता’ क्या ! उषा (प्रभात काल) और नक्ता [रात्रि] । ‘नक्ता’ यहरात्रि का नाम है। क्योंकि-अवश्याय (ओस) से सब पदार्थों को ‘अनक्ति’ गीले कर देती है । अथवा वह अव्यक्तवर्णा होने से ‘नक्ता’ है अर्थात् अंधेरे के कारण उस में