निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २१२ ) ६ अ० १ पा० ४ खं० 'नावम्-वृक्ष' नाव को जैसे 'वाचम्' वाणी को 'ईयत्ति' प्रेरणा करता है- (यथा अस्य शब्दः तथा नाम ईरयति वाचम्) जैसा इसका शब्द है, वैसे ही वाणी को चलाता है-जैसी सुन्दर सुरीली बोली = आवाज है, वैसा ही शुभ अर्थ उसमें कहता है। हे सौन चिड़ी ? ( त्वम् ) तू 'सुमङ्गलः' (कल्याणमङ्गलः ) कल्याण मङ्गल के देने वाली 'भवासि' (भव) हो । और हम भी तेरे लिये ऐसा चाहते हैं-'त्वा' तुझे ' काचित् ' कोई 'अभिभा' (अभिभूतिः) तिरस्कार 'विश्वतः' ( सर्वतः ) कहीं से भी 'मा' मत 'विदत्' (विन्दतु) आवे ॥ 'मङ्गल' कैसे ? ' गृणाति' ( उगीरता है) (आलाप करता है) के अर्थ में ' (तु० प०) गृधातु से है। जब कभी कोई आनन्दमग्न ( मस्त ) होकर बिना किसी अर्थ के स्वर का आलाप करता है-रागता है, वह शब्द कार्य के आरम्भ में मङ्गलदायक समझाजाता है । अथवा वह अनर्थों को निगल जाता है, इससे 'मङ्गल' है । अथवा ' अङ्गल ' शब्द ' म' जुड़ने से मङ्गल होता है । 'अङ्गल' क्या ? अङ्गवाला । 'अङ्ग' शब्द से मत्वर्थ ( वाला अर्थ ) में ' र प्रत्यय होता है, और उस ' र ' का 'ल' बदल जाता है (जैसा कि व्याकरण में माना हुआ है)। दही, मधु, और अक्षत आदि मगल के अंग हैं। उन्ही से वह अंग वाला होकर 'मगल' कहा जाता है । 'मज्जयति' ( डुबा देता है, अनर्थ को ) इससे मंगल ' है, यह नैरुक्त आचार्य जानते है । इस मतमें 'मज्जन' क्रिया से 'मंगल' शब्द बनता है ।