निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] हिन्दी निरुक्त ( २१३ ) ६ अ० १ पा० ५ खं० अथवा 'मां गच्छतु' (मुझे यह मिले) वाक्य से 'मंगल' शब्द निकला ॥ “गृत्समदम०” गृत्समद ऋषि किसी समय किसी कार्य को सिद्धकरने के लिए उठे और उठते हुए उनको कपिञ्जल = सौन चिड़ीने उनकी सिद्धि को कहते हुए संमुख शब्द किया । उसी अर्थ को कहने वाली यह ऋचा है उसी की प्रशंसा में ऋषि को यह ऋचा दिखाई दी ॥ ४ ॥ ( खं० ५ ) निघ०- "भद्रं वद दक्षिणतो भद्र मुत्तरतो वद । भद्रं पुरस्तान्नो वद भद्रं पश्चात्कपिञ्जलः ॥” ( ) ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ 'गृत्समदः' गृत्समदनः । 'गृत्स' इति मेधाविनाम । गृणातेः स्तुति- कर्मणः ॥ 'मण्डूकाः' मज्जुकाः । मज्जनात् । मदते र्वा मोदतिकर्मणः । मन्दतेर्वा तृप्तिकर्मणः । 'मण्डयतेः' इति वैयाकरणाः । 'मण्डः एषाम्-ओकः' इति वा । 'मण्डः' मदेर्वा । मुदेर्वा । तेषाम्-एषा भवति-॥ ५ ॥ अर्थः- “भद्रं वद” । शकुनि [पक्षी] किसी दिशा में